जगन्नाथ पुरी की तर्ज पर छतरपुर में खिंचेगा महाप्रभु का रथ; महाराज खुद खींचते थे भगवान की डोर
मध्य प्रदेश के छतरपुर में 350 वर्षों से आयोजित होने वाली भव्य जगन्नाथ रथ यात्रा आज शाम 5 बजे से शुरू हो रही है। जानिए इस रियासत कालीन परंपरा का पूरा इतिहास।
छतरपुर। देश के बड़े धार्मिक त्योहारों को स्थानीय स्तर पर पूरी श्रद्धा के साथ मनाने का चलन अब एक सुंदर परंपरा बन चुका है. ऐसा ही एक अनूठा और भव्य नजारा छतरपुर में देखने को मिलता है, जहां ओड़िशा के जगन्नाथ पुरी की तर्ज पर भगवान जगन्नाथ की भव्य रथ यात्रा निकाली जाती है. स्थानीय लोगों और इतिहासकारों का दावा है कि छतरपुर की यह रथ यात्रा कोई नई शुरुआत नहीं है, बल्कि पिछले करीब 350 सालों से जगन्नाथ पुरी की मूल यात्रा के समय ही यहां भी रथ यात्रा निकालकर इस महापर्व को पूरी आस्था के साथ मनाया जा रहा है. रियासत काल से शुरू हुई यह परंपरा आज भी पूरी गरिमा के साथ जीवंत है. इस वर्ष यह भव्य रथ यात्रा आज यानी 16 जुलाई को शाम 5:00 बजे से पूरी भव्यता के साथ शुरू हो रही है. इस पावन अवसर पर 16 जुलाई से 19 जुलाई तक पुरानी तहसील महल परिसर में चार दिवसीय भव्य धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का विशाल आयोजन किया जाएगा.
👑 2. जब रियासत के महाराज स्वयं खींचते थे भगवान का रथ: पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवंत है यह अनोखी परंपरा
इतिहासकारों के अनुसार, करीब साढ़े तीन सौ साल पहले यहां के प्रतिष्ठित पौराणिक परिवार द्वारा प्राचीन 'स्वामी जू मंदिर' की नींव रखी गई थी. उस दौर में मंदिर में पूरी विधि-विधान और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और माता सुभद्रा की प्रतिमाओं की स्थापना की गई थी. छतरपुर के तमराई मोहल्ला स्थित स्वामी जू मार्ग पर यह रियासत कालीन प्राचीन मंदिर आज भी आस्था का मुख्य केंद्र है.
रियासत काल में तत्कालीन महाराज विश्वनाथ सिंह खुद भगवान को सिंहासन पर विराजमान कर नगर भ्रमण पर निकालते थे. इसके बाद जब छतरपुर रियासत की बागडोर उनके पुत्र महाराज भवानी सिंह जू देव को मिली, तो वह भी इस रथ यात्रा में पूरी श्रद्धा से शामिल होने लगे. महाराज भवानी सिंह स्वयं भगवान का रथ खींचकर महल परिसर तक लाते थे. उन्हीं के शासनकाल में छतरपुर में भगवान के लिए एक विशेष काष्ठ (लकड़ी) के रथ का निर्माण करवाया गया था, जो लगातार 50 वर्षों तक इस यात्रा का सारथी बना रहा. बाद में समय के साथ नया भव्य रथ तैयार किया गया.
🚩 3. रथ यात्रा में लगाए जाते हैं तीन विशेष रंगों के ध्वज: जानें क्या है इनका धार्मिक रहस्य
इस ऐतिहासिक रथ यात्रा की एक बड़ी विशेषता इसमें इस्तेमाल होने वाले तीन अलग-अलग रंगों के ध्वज हैं, जिनका अपना विशेष धार्मिक महत्व है. मंदिर के पुजारी विकास पौराणिक ने इस संबंध में विस्तार से जानकारी देते हुए बताया:
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पीला ध्वज (भगवान जगन्नाथ स्वामी): भगवान जगन्नाथ स्वामी का एक प्रमुख नाम 'पीतवास' (पीले वस्त्र धारण करने वाले) है, इसलिए उनके रथ के ध्वज का रंग पीला होता है.
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लाल ध्वज (माता सुभद्रा): माता सुभद्रा को शक्ति स्वरूपा देवी अंबिका का अवतार माना जाता है, इसलिए उनके रथ पर लाल रंग का ध्वज लगाया जाता है.
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नीला ध्वज (बलदाऊ जी): भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलभद्र (बलदाऊ) को शेषनाग का अवतार माना जाता है. उनका एक नाम 'नीलांबर' (नीले वस्त्र धारण करने वाले) भी है, इसलिए उनके रथ के ध्वज का रंग नीला होता है, जिसे शास्त्रों में 'ताल ध्वज' भी कहा जाता है.
🙏 4. 350 साल पहले सिंहासन से शुरू हुआ था सफर: मंदिर में अर्जी लगाने से पूरी होती है हर मनोकामना
छतरपुर के इस प्राचीन स्वामी जू मंदिर को लेकर भक्तों के बीच गहरी आस्था और कई अटूट मान्यताएं हैं. माना जाता है कि इस मंदिर में भगवान जगन्नाथ के दरबार में जो भी भक्त अपनी सच्ची अर्जी लगाता है, उसकी मनोकामना कभी खाली नहीं जाती. मंदिर के पुजारी विकास पौराणिक बताते हैं कि करीब 350 साल पहले तत्कालीन राज परिवार ओड़िशा के पुरी से विशेष रूप से इन विग्रहों (मूर्तियों) को बनवाकर यहां लाया था. तब पहली बार पुरी की तर्ज पर ही सिंहासन पर भगवान की यात्रा निकालने की शुरुआत हुई थी.
इतिहासकारों का मत: मंदिर के प्राचीन इतिहास को लेकर रिटायर्ड प्रोफेसर बहादुर सिंह परमार बताते हैं, "यह मंदिर और इसमें स्थापित मूर्तियां अत्यंत प्राचीन एवं ऐतिहासिक हैं. छतरपुर के महाराज विश्वनाथ सिंह खुद सोने-चांदी के सिंहासन को संभालते हुए भगवान के रथ के साथ पैदल चलते थे. महल परिसर के पास ही भगवान का रथ विश्राम करता था, जहां चार दिनों तक उत्सव चलता था. प्रसन्नता की बात है कि पूर्वजों द्वारा शुरू की गई वह गौरवशाली परंपरा आज भी छतरपुर की जनता पूरी श्रद्धा के साथ निभा रही है."
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