मां बिरासिनी दरबार में गुप्त नवरात्रि की धूम; जानें क्यों खास है 10वीं सदी की यह कल्चुरी कालीन प्रतिमा
मध्य प्रदेश के उमरिया में स्थित मां बिरासिनी शक्तिपीठ में गुप्त नवरात्रि पर विशेष अनुष्ठान आयोजित किए जा रहे हैं। जानें 10वीं सदी के इस ऐतिहासिक मंदिर की खासियत, महत्व और जीर्णोद्धार का इतिहास।
उमरिया। मध्य प्रदेश के उमरिया जिले के बिरसिंहपुर पाली में विराजीं प्रसिद्ध शक्तिपीठ मां बिरासिनी के भव्य दरबार में इन दिनों बड़े ही गुप्त और सात्विक तरीके से गुप्त नवरात्रि मनाई जा रही है. मंदिर परिसर में संपूर्ण विधि-विधान और वैदिक परंपराओं के साथ विशेष पूजा-पाठ का आयोजन किया जा रहा है. मां बिरासिनी शक्तिपीठ के मुख्य पुजारी छोटू पंडा ने बताया कि मंदिर में गुप्त नवरात्रि का विशेष अनुष्ठान और पाठ चल रहा है, जो लगातार 9 दिनों तक अनवरत चलेगा. इस पावन अवसर पर मां बिरासिनी प्रांगण में विद्वान पंडित और पुजारी जगह-जगह बैठकर गुप्त साधना व दुर्गा सप्तशती का पाठ कर रहे हैं. इसके साथ ही माता की प्रसन्नता के लिए प्रतिदिन विशेष पूजा-अर्चना और महाआरती भी आयोजित की जा रही है.
शक्तिपीठ मां बिरासिनी के दरबार में गुप्त नवरात्रि के सुअवसर पर विभिन्न प्रकार के धार्मिक और आध्यात्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जा रहे हैं. सनातन शास्त्रों के अनुसार गुप्त नवरात्रि में की जाने वाली पूजा और आराधना का एक विशेष महत्व होता है, जिससे भक्तों को मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है.
आमतौर पर आम जनमानस केवल दो नवरात्रों के बारे में ही विस्तार से जानता है, जिनमें पहली चैत्र नवरात्रि और दूसरी शारदीय नवरात्रि शामिल हैं. परंतु हमारे सनातन ग्रंथों और शास्त्रों में दो अन्य गुप्त नवरात्रों का भी स्पष्ट वर्णन मिलता है. इनमें से एक आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से लेकर नवमी तिथि तक (जो जून से जुलाई के मध्य आती है) और दूसरी माघ मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तिथि तक चलती है.
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से गुप्त नवरात्रि को सामान्य नवरात्रि की तुलना में काफी कठिन और भिन्न माना जाता है. इस विशेष अवधि में मां दुर्गा के नौ रूपों के साथ-साथ दस महाविद्याओं की तंत्र व सात्विक उपासना का विशेष महत्व है. श्रद्धालु इस दौरान मंत्रों का मानसिक जाप, विशेष हवन एवं दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं.
विशेष तौर पर भगवती से आध्यात्मिक सिद्धियां प्राप्त करने के लिए ही गुप्त नवरात्रि में अनुष्ठान किए जाते हैं. चूंकि इस दौरान किए जाने वाले सभी अनुष्ठान, मंत्र जाप और साधनाएं बड़े ही गोपनीय (गुप्त) तरीके से किए जाते हैं, इसीलिए इसे शास्त्रों में 'गुप्त नवरात्रि' के नाम से संबोधित किया गया है. हालांकि आम लोग इसके महत्व से अनजान रहते हैं, लेकिन इस दौरान की गई सच्ची निष्काम भक्ति से भक्तों की सभी मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होती हैं.
इस सुप्रसिद्ध शक्तिपीठ के ऐतिहासिक महत्व, प्रतिमा की विशेषता और मंदिर के निर्माण से जुड़े प्रमुख तथ्यों को नीचे दी गई तालिका के माध्यम से आसानी से समझा जा सकता है:
| प्रमुख पहलू | ऐतिहासिक एवं धार्मिक विवरण | विशेष तथ्य व सांख्यिकी |
| मंदिर व स्थान | मां बिरासिनी शक्तिपीठ, बिरसिंहपुर पाली (उमरिया, म.प्र.) | 10वीं शताब्दी की प्राचीन कल्चुरी कालीन प्रतिमा. |
| प्रतिमा की विशेषता | महाकाली का भव्य रूप, दुर्लभ काले पत्थर से निर्मित | देश की चुनिंदा मूर्तियों में शामिल, जहां माता की जिह्वा (जीभ) बाहर नहीं है. |
| वार्षिक नवरात्रि | कुल 4 नवरात्रि (2 सामान्य व 2 गुप्त नवरात्रि) | आषाढ़ और माघ मास में होती है 10 महाविद्याओं की गुप्त साधना. |
| जीर्णोद्धार प्रारंभ | 23 नवंबर 1989 (स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी के करकमलों द्वारा) | कुल निर्माण लागत लगभग ₹27 लाख रुपये. |
| सहयोगी संस्थाएं | स्थानीय नागरिक, कोलरी प्रबंधन और क्षेत्र के दानदाता | मंदिर का वास्तुकला चित्र (Design) NBCC नई दिल्ली द्वारा निशुल्क मिला. |
| भव्य लोकार्पण | 22 अप्रैल 1999 (स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी के शुभाशीष से) | वर्तमान में महाकौशल और बुंदेलखंड अंचल का प्रमुख आस्था केंद्र. |
बिरासिनी मंदिर में विराजीं मां बिरासिनी की दिव्य प्रतिमा ऐतिहासिक कल्चुरी कालीन है. पुरातात्विक विशेषज्ञों के अनुसार, इस भव्य मंदिर और मूर्ति का निर्माण 10वीं सदी के आसपास कराया गया था. दुर्लभ काले पत्थर से निर्मित महाकाली की यह भव्य मूर्ति पूरे देश में अपनी तरह की अनूठी और गिनी-चुनी प्रतिमाओं में से एक है.
इस प्रतिमा की सबसे बड़ी और अलौकिक विशेषता यह है कि इसमें माता महाकाली की जिह्वा (जीभ) बाहर नहीं निकली हुई है, जो कि महाकाली के शांत और ममतामयी रूप को प्रदर्शित करती है. यही कारण है कि देश भर से पुरातत्व प्रेमी और श्रद्धालु इस अनूठी प्रतिमा के दर्शन के लिए खिंचे चले आते हैं.
वर्षों तक एक छोटे स्वरूप में रहने के बाद, 23 नवंबर 1989 को तत्कालीन जगतगुरु शंकराचार्य शारदा पीठाधीश्वर स्वामी श्री स्वरूपानन्द सरस्वती जी के पावन करकमलों द्वारा बिरासिनी मंदिर के भव्य जीर्णोद्धार कार्य का शुभारंभ किया गया था.
पूर्ण रूप से निर्मित होने के बाद बिरासिनी मंदिर का भव्य लोकार्पण 22 अप्रैल 1999 को जगतगुरु शंकराचार्य पुरी पीठाधीश्वर स्वामी श्री निश्चलानंद सरस्वती जी के शुभाशीष और सानिध्य में संपन्न हुआ था. आज यह मंदिर न केवल उमरिया बल्कि पूरे मध्य प्रदेश की आस्था का एक प्रमुख केंद्र बन चुका है.
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