देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के चक्कर काट रहे पूर्व छात्र; आईएमएस के 'कंसोर्टियम' कोर्स में फंसा तकनीकी पेंच

देवी अहिल्या विश्वविद्यालय (DAVV) इंदौर में दो दशक पहले बंद हो चुके एमबीए कंसोर्टियम पाठ्यक्रम के पूर्व छात्रों की डिग्रियां रिकॉर्ड में परीक्षा परिणाम की तारीख दर्ज न होने के कारण अटक गई हैं।

Jul 20, 2026 - 09:59
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देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के चक्कर काट रहे पूर्व छात्र; आईएमएस के 'कंसोर्टियम' कोर्स में फंसा तकनीकी पेंच

इंदौर। मध्य प्रदेश के प्रतिष्ठित देवी अहिल्या विश्वविद्यालय (डीएवीवी) के इंस्टीट्यूट ऑफ规范 मैनेजमेंट स्टडीज (आईएमएस) से संचालित होने वाला एमबीए पार्ट टाइम (कंसोर्टियम) पाठ्यक्रम बंद हुए दो दशक (20 वर्ष) से अधिक का समय बीत चुका है. इसके बावजूद, इस रोजगारोन्मुखी कोर्स को पूरी निष्ठा के साथ पूरा कर चुके कई पूर्व विद्यार्थी आज भी अपनी मूल डिग्री प्राप्त करने के लिए भटक रहे हैं.

डिग्री के लिए विधिवत आवेदन कर चुके यह छात्र विश्वविद्यालय के प्रशासनिक संकुल और आईएमएस विभाग के बीच चक्कर लगाने को मजबूर हैं. गंभीर स्थिति यह है कि दोनों ही विभागों के पास इस ऐतिहासिक पाठ्यक्रम के परीक्षा परिणाम (रिजल्ट) घोषित होने की सटीक तारीख का कोई लिखित रिकॉर्ड मौजूद नहीं है, जिसके कारण तकनीकी रूप से विद्यार्थियों की डिग्री जारी करने की प्रक्रिया पूरी तरह ठप हो गई है.

📜 1. डिग्री का नया प्रारूप बना पूर्व छात्रों के लिए बड़ी मुसीबत

विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा कुछ वर्षों पूर्व डिग्री के आधिकारिक प्रारूप (Format) में बड़ा बदलाव किया गया था. नए नियमों के तहत अब डिग्री के ऊपर परीक्षा परिणाम घोषित होने की सटीक तारीख का उल्लेख करना अनिवार्य कर दिया गया है. पिछले महीने एमबीए कंसोर्टियम के कुछ पूर्व छात्रों ने अपनी डिग्रियों के लिए विश्वविद्यालय में आवेदन किया था, लेकिन निर्धारित समय सीमा बीत जाने के बाद भी जब उन्हें डिग्री नहीं मिली, तो उन्होंने इसकी पड़ताल शुरू की.

जब आवेदकों ने संबंधित परीक्षा विभाग से जानकारी ली, तो पता चला कि विश्वविद्यालय के मुख्य रिकॉर्ड में उनके परिणाम घोषित होने की तारीख दर्ज ही नहीं है. इस संबंध में परीक्षा विभाग ने आईएमएस (IMS) प्रबंधन से जानकारी मांगी, लेकिन वहां उपलब्ध टेबुलेशन चार्ट (Tabulation Chart) में भी परिणाम जारी होने की तिथि का कॉलम खाली मिला. इससे डिग्री जारी करने की पूरी प्रक्रिया अधर में लटक गई. आवेदक मनीष तिवारी के अनुसार, उनकी ही बैच के एक सहपाठी को वर्षों पहले डिग्री जारी की जा चुकी है, जिसमें दिसंबर 1997 की तारीख अंकित है. हालांकि, विभाग का तर्क है कि वह तारीख परिणाम घोषित होने की नहीं, बल्कि उस वर्ष आयोजित दीक्षांत समारोह की थी.

📊 2. डीएवीवी एमबीए कंसोर्टियम डिग्री विवाद: एक नजर में मुख्य विवरण

इस पूरे मामले के तकनीकी पेंच, पाठ्यक्रम के इतिहास और वर्तमान प्रशासनिक प्रयासों के विवरण को नीचे दी गई तालिका के माध्यम से आसानी से समझा जा सकता है:

परियोजना व पाठ्यक्रम का नाम एमबीए पार्ट टाइम (कंसोर्टियम) मुख्य तकनीकी समस्या
संचालक संस्थान इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज (IMS), DAVV इंदौर डिग्री के नए प्रारूप में 'रिजल्ट की तारीख' अनिवार्य होना.
पाठ्यक्रम संचालन की अवधि 1990 के दशक से शुरू होकर वर्ष 2004 तक डीएवीवी और आईएमएस के टेबुलेशन चार्ट में तारीख दर्ज न होना.
मुख्य पीड़ित वर्ग नौकरीपेशा और इंडस्ट्री से जुड़े पूर्व छात्र प्रभावित आवेदक (उदाहरण): मनीष तिवारी व अन्य सहपाठी.
अंकसूची मुद्रण केंद्र नई दिल्ली से मुद्रित होकर आती थीं अंकसूचियां अंतिम निर्णय प्राधिकारी: कुलगुरु डॉ. राकेश सिंघई.
समाधान का वर्तमान प्रयास प्रशासनिक संकुल द्वारा भेजी गई विशेष नोटशीट संभावित या दीक्षांत समारोह की तारीख को आधार बनाने पर विचार.
📝 3. समाधान के लिए चलाई नोटशीट; कुलगुरु डॉ. राकेश सिंघई करेंगे अंतिम फैसला

वर्षों बाद अपने करियर के इस पड़ाव पर पूर्व विद्यार्थियों को हो रही इस मानसिक और प्रशासनिक परेशानी को देखते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन अब इस गंभीर समस्या का व्यावहारिक समाधान निकालने में जुट गया है. परीक्षा विभाग ने एक अनूठा रास्ता खोजते हुए पूर्व में जारी की जा चुकी एक डिग्री को आधार मानते हुए परिणाम की एक 'संभावित तारीख' निर्धारित करने का विकल्प चुना है.

इसी सिलसिले में प्रशासनिक संकुल की तरफ से एक आधिकारिक नोटशीट तैयार कर आईएमएस विभाग को भेज दी गई है. अब आईएमएस और एमबीए विभाग को इस पुराने मामले में अपनी स्थिति और रिकॉर्ड की जांच कर रिपोर्ट सौंपनी होगी. इसके बाद यह महत्वपूर्ण फाइल अंतिम मंजूरी और संशोधन के लिए विश्वविद्यालय के कुलगुरु डॉ. राकेश सिंघई के समक्ष प्रस्तुत की जाएगी.

🎓 4. नौकरीपेशा लोगों के लिए शुरू हुआ था यह ऐतिहासिक कंसोर्टियम पाठ्यक्रम

उल्लेखनीय है कि 1990 के दशक में देश के औद्योगिक विकास के साथ एमबीए (MBA) की डिग्री की भारी मांग रहती थी. लेकिन सीटों की संख्या बेहद सीमित होने के कारण अनेक योग्य छात्र और कामकाजी पेशेवर नियमित (Regular) पाठ्यक्रमों में प्रवेश पाने से वंचित रह जाते थे. ऐसे में नौकरीपेशा लोगों को उच्च स्तरीय प्रबंधन शिक्षा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से आईएमएस ने स्थानीय इंडस्ट्रीज के सहयोग से इस विशेष 'एमबीए कंसोर्टियम' पाठ्यक्रम की शुरुआत की थी.

इसकी कक्षाएं नौकरीपेशा छात्रों की सुविधा के लिए सप्ताह में केवल दो दिन, शाम के समय आयोजित की जाती थीं. परीक्षा संचालन और कॉपियों के मूल्यांकन का पूरा कार्य आईएमएस इंदौर स्वयं संभालता था, जबकि छात्रों की अंतिम अंकसूचियां नई दिल्ली से मुद्रित होकर आती थीं. यह लोकप्रिय पाठ्यक्रम वर्ष 2004 तक सफलतापूर्वक संचालित हुआ. बाद में विश्वविद्यालय द्वारा एमबीए एग्जीक्यूटिव और दूरस्थ शिक्षा निदेशालय (DDE) से एमबीए पाठ्यक्रम शुरू किए जाने के बाद इस पुराने कंसोर्टियम कोर्स को बंद कर दिया गया था. अब दशकों बाद डिग्री संबंधी इस छोटी सी तकनीकी खामी के कारण बुजुर्ग हो रहे पूर्व विद्यार्थी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं.

🤝 5. रिकॉर्ड सुधारने के लिए निकाला जा रहा है बीच का रास्ता

विश्वविद्यालय के परीक्षा नियंत्रक और प्रशासनिक अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि एमबीए कंसोर्टियम पाठ्यक्रम के रिजल्ट की सही तारीख न होना एक व्यावहारिक समस्या है. चूंकि यह कोर्स बेहद पुराना है और उस समय कंप्यूटर के बजाय मैन्युअल रिकॉर्ड रखे जाते थे, इसलिए यह खामी सामने आई है. प्रशासन का कहना है कि छात्रों के हितों को ध्यान में रखते हुए नियमों के दायरे में रहकर बीच का रास्ता निकाला जा रहा है. जैसे ही आईएमएस से नोटशीट का सकारात्मक जवाब प्राप्त होगा, फाइल कुलगुरु के पास हस्ताक्षर के लिए भेज दी जाएगी ताकि पूर्व छात्रों को जल्द से जल्द उनकी डिग्रियां सौंपी जा सकें.

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