इंदौर में जल संरक्षण की अनूठी पहल, सॉफ्ट पानी वाली प्राचीन बावड़ी में फिर से लौटा नीर
इंदौर के कंचन विहार में जन सहयोग और नगर निगम की पहल से प्राचीन बावड़ी को पुनर्जीवित किया गया है। इसके सॉफ्ट पानी से मशहूर दाल-बाफले की दाल जल्दी पकती है।
इंदौर: पीने के पानी की भी अलग-अलग महिमा होती है। कोई पानी त्वचा रोग ठीक करने के लिए उपयोग होता है, तो कोई धार्मिक आचमन करने के लिए। दाल-बाफले के शहर इंदौर में ऐसे ही खास पानी की बावड़ी को जन सहयोग से सहेजा गया है, जिसके पानी को दशकों से स्वादिष्ट दाल बनाने के लिए उपयोग में लिया जाता था।
🤝 जन सहयोग से पुनर्जीवित हुई बावड़ी
इंदौर के वार्ड नंबर 34 स्थित कंचन विहार में इस खास बावड़ी का पानी एक बार फिर कंचन हो चुका है। दरअसल, इसकी वजह यहां के स्थानीय लोगों की पहल है। वार्ड की पार्षद सीमा संजय चौधरी के प्रयासों की बदौलत यह प्राचीन बावड़ी अब एक बार फिर पुनर्जीवित हो सकी है। गर्मी के दिनों में जब इस प्राचीन बावड़ी में दाल बनाने के लिए भी पानी नहीं बचा, तो नगर निगम इंदौर के जल संवर्धन अभियान के तहत बावड़ी के पास मौजूद आम के बगीचे में रिचार्ज शाफ्ट और वाटर रिचार्ज यूनिट स्थापित की गई।
🛡️ बावड़ी को बड़े लोहे के जाल से ढका गया
इसके बाद पूरे बगीचे के पानी को जमीन में उतारने के लिए तरह-तरह के पौधे, जल संरचनाएं तथा ढलान को बावड़ी की तरफ बनाया गया। इसके बाद धीरे-धीरे बावड़ी में पानी का जलस्तर बढ़ने लगा। खुले मुंडेर और आसपास के कचरे से बावड़ी का पानी दूषित न हो सके, इसके लिए पूरी बावड़ी को बड़े लोहे के जाल से ढका गया है, जिसमें ग्रीन नेट लगाकर बारिश के दौरान ताला डाल दिया गया है।
अब जबकि क्षेत्र में अन्य स्थानों की तरह ही सामान्य बारिश हो रही है, तो बावड़ी का पानी भी धीरे-धीरे बढ़ रहा है। ऐसी स्थिति में आसपास के लोगों और गृहणियों को अब इसलिए भी राहत मिल सकी है कि बावड़ी के पानी से उनकी दाल आसानी से पक जाने के बाद, बाफले के साथ पहले की तरह स्वादिष्ट जायका प्रदान कर सकेगी।
🍲 सॉफ्ट पानी में इसलिए पक जाती है जल्दी दाल
दरअसल, सॉफ्ट (मृदु) पानी में कैल्शियम और मैग्नीशियम जैसे तत्व नहीं होते, जिसकी बदौलत ऐसे पानी को दाल जल्दी सोख लेती है और कठोर पानी के मुकाबले यह जल्दी पक जाती है। ऐसा इसलिए भी होता है क्योंकि सॉफ्ट पानी का पीएच (pH) लेवल 6.5 से 7 तक होता है, जबकि हार्ड पानी का पीएच लेवल 7 से 8.5 के बीच होता है।
क्षेत्रीय पार्षद संजय चौधरी बताते हैं कि, "करीब 25 साल पहले जब यह प्राचीन बावड़ी जीवित थी, तब निरंजनपुर और आसपास के गांव के लोग इस बावड़ी का पानी दाल बनाने के लिए लेने आते थे। समय के साथ बावड़ी नष्ट हो गई थी, जिसे पुनर्जल भरण अभियान के तहत फिर से विकसित किया गया है।"
🌳 भूजल स्तर बढ़ाने के लिए बगीचे में वृक्षारोपण
भविष्य में यह बावड़ी पानी से लबालब रहे, इसलिए इसके आसपास अब कॉलोनी के लोग वृक्षारोपण कर रहे हैं। दरअसल, मान्यता यह भी है कि जहां वृक्षों की अधिकता होती है, वहां वे भूजल को रोक कर रखते हैं। इसीलिए अब न केवल उद्यान बल्कि बावड़ी को बचाए रखने के लिए क्षेत्र में नगर निगम और स्थानीय पार्षद की पहल से लगातार वृक्षारोपण किया जा रहा है।
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