हाईकोर्ट ने पलटा सेशन कोर्ट का फैसला, नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में आरोपी को किया बरी
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने दुष्कर्म के एक मामले में निचली अदालत का फैसला पलटते हुए आरोपी को बरी कर दिया है। कोर्ट ने रेडियोलॉजिस्ट की मेडिकल रिपोर्ट को सही माना है।
जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण मामले में निचली अदालत (सेशन कोर्ट) के फैसले को पूरी तरह से पलट दिया है। अदालत ने नाबालिग से दुष्कर्म के एक मामले में सुनवाई करते हुए आरोपी शख्स को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। हाईकोर्ट ने अपने इस फैसले में रेडियोलॉजिस्ट की उस मेडिकल रिपोर्ट पर मुख्य रूप से भरोसा जताया है, जिसके अनुसार घटना के वक्त पीड़िता बालिग (यानी 18 वर्ष से अधिक आयु की) थी।
यह फैसला जस्टिस वी.के. अग्रवाल और जस्टिस ए.के. सिंह की खंडपीठ द्वारा सुनाया गया है। गौरतलब है कि इससे पहले आरोपी को उम्रकैद की सजा बालाघाट जिले की वारासिवनी कोर्ट द्वारा सुनाई गई थी।
📑 स्कूल रिकॉर्ड पर भारी पड़ी रेडियोलॉजिस्ट की वैज्ञानिक रिपोर्ट
हाईकोर्ट ने अपने फैसले की व्याख्या करते हुए कहा कि, ''पीड़िता की उम्र के सही निर्धारण के मामले में रेडियोलॉजिस्ट की मेडिकल राय, स्कूल के दाखिला रजिस्टर (जिसमें जन्मतिथि 19 दिसंबर 2003 दर्ज थी) की तुलना में कहीं अधिक भरोसेमंद प्रतीत होती है।''
घटना 30 जुलाई 2021 की बताई गई थी, जिसके बाद 2 अगस्त 2021 को एक महिला डॉक्टर द्वारा पीड़िता की चिकित्सीय जांच कराई गई थी। उम्र के सटीक आकलन के लिए रेडियोलॉजिस्ट की भी विशेषज्ञ राय ली गई थी, जिनकी जांच रिपोर्ट में यह स्पष्ट रूप से सामने आया था कि पीड़िता की उम्र 18 साल से अधिक थी। हालांकि, सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष (Prosecution) ने इस महत्वपूर्ण एक्स-रे रिपोर्ट को ट्रायल कोर्ट में मुख्य सबूत के तौर पर पेश नहीं किया था, लेकिन इसके बावजूद यह दस्तावेज पूरी केस फाइल का हिस्सा जरूर था।
कोर्ट ने आगे टिप्पणी करते हुए कहा कि वारासिवनी की निचली अदालत ने बिना कोई ठोस कारण बताए इस अहम मेडिकल रिपोर्ट और डॉक्टर की राय को नजरअंदाज करने की गंभीर भूल की थी। इसके अलावा, सुनवाई के दौरान पीड़िता के स्कूल के प्रिंसिपल भी अदालत में यह संतोषजनक रूप से बताने में असमर्थ रहे कि आखिर स्कूल के एडमिशन रजिस्टर में किस आधार पर लड़की की जन्मतिथि दर्ज की गई थी।
⚖️ आरोपी के वकील की दलील और कोर्ट का निष्कर्ष
मामला की सुनवाई के दौरान आरोपी पक्ष के वकील ने जोरदार दलील दी कि दोनों के बीच के संबंध पूरी तरह से आपसी सहमति से बने थे। उन्होंने अदालत के समक्ष एक मैरिज सर्टिफिकेट (विवाह प्रमाण पत्र) भी पेश किया और स्कूल रिकॉर्ड में दर्ज जन्मतिथि की प्रमाणिकता को कड़ी चुनौती दी।
दोनों पक्षों की तमाम दलीलें विस्तार से सुनने के बाद हाईकोर्ट ने आरोपी को बरी कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा कि घटना वाले दिन (30 जुलाई 2021) पीड़िता की उम्र 18 वर्ष से कम थी। इसके अलावा, अभियोजन यह साबित करने में भी असफल रहा कि पीड़िता को किसी भी प्रकार से डरा-धमकाकर या जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाने के लिए मजबूर किया गया था, जिससे यह पूरा मामला कानूनी रूप से दुष्कर्म (Rape) की श्रेणी में आ सके।
🔍 क्या था पूरा घटनाक्रम और मामला?
पीड़िता के परिवार द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, कक्षा 12वीं में पढ़ने वाली छात्रा 21 जुलाई 2021 को अचानक अपने घर से गायब हो गई थी। पिता की गुमशुदगी की शिकायत पर पुलिस ने तुरंत जांच-पड़ताल शुरू की और 31 जुलाई 2021 को लड़की को बेंगलुरु से सकुशल बरामद कर लिया गया।
लड़की ने पुलिस को दिए अपने आधिकारिक बयान में बताया था कि वह अपनी मां की डांट से नाराज होकर 19 जुलाई 2021 को घर छोड़कर अकेली ही बाहर निकल गई थी। रास्ते में उसे आरोपी मिला, जिसने शुरुआत में उसे वापस घर जाने की सलाह दी थी। लेकिन जब लड़की ने लौटने से साफ इनकार कर दिया, तो वह उसे अपने एक दोस्त के घर ले गया। इसके बाद वे दोनों नागपुर और हैदराबाद के रास्ते होते हुए 24 जुलाई को बेंगलुरु पहुँचे, जहाँ 30 जुलाई को आरोपी के साथ उसके संबंध बने थे।
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