'बुंदेलखंड के वृंदावन' में रक्षाबंधन की अनोखी परंपरा, कन्हैया को लेने पहुंचते हैं बड़े भैया बलदाऊ
सागर के प्रसिद्ध अटल बिहारी मंदिर में रक्षाबंधन के दिन एक अनोखी परंपरा निभाई जाती है, जहां बड़े भैया बलदाऊ कन्हैया को लेने पहुंचते हैं। जानें इस 300 साल पुराने मंदिर का इतिहास।
मध्य प्रदेश के सागर शहर के सराफा बाजार को बुंदेलखंड का वृंदावन कहा जाता है, क्योंकि यहां भगवान कृष्ण से जुड़े लगभग हर संप्रदाय के भव्य मंदिर स्थित हैं। इनमें भी यहां विराजे 'अटल बिहारी सरकार' के मंदिर की महिमा और आस्था पूरे शहर व आसपास के इलाकों में बेहद गहरी है। इस प्राचीन अटल बिहारी मंदिर में रक्षाबंधन के पावन पर्व पर एक बेहद अनोखी और दुर्लभ परंपरा निभाई जाती है, जिसे देखने के लिए दूर-दूर से भक्तों का तांता लगता है। इस परंपरा के अनुसार, रक्षाबंधन के दिन भगवान कृष्ण के बड़े भाई बलदाऊ जी मंदिर पहुंचते हैं और कन्हैया से कहते हैं कि सावन के झूलों की मस्ती बहुत हो चुकी, अब अन्य जिम्मेदारियां भी पूरी करनी हैं, और वे उन्हें अपने साथ लेकर लौटते हैं।
📜 300 साल पुराना इतिहास: क्यों कहलाते हैं 'अटल बिहारी सरकार'?
सागर के लोग अपने आराध्य को प्यार से बिहारी जी पुकारते हैं, लेकिन उनका वास्तविक नाम अटल बिहारी है। मंदिर के पुजारी पंडित महेंद्र पाराशर बताते हैं कि यह मंदिर प्राचीन निंबार्क परंपरा से जुड़ा है, जिसका इतिहास 5000 साल से अधिक पुराना है। इस मंदिर की स्थापना करने वाले दयाल दास महाराज ठाकुर जी की मूर्ति को लेकर कहीं और जा रहे थे, लेकिन जब वे सागर पहुंचे तो ठाकुर जी यहीं पर 'अटल' हो गए और आगे नहीं बढ़े। तभी से लगभग 300 साल पहले इन्हें 'अटल बिहारी सरकार' के रूप में स्थापित किया गया, और आज भी यहां निंबार्क परंपरा के अनुसार ही सभी उत्सव और पूजा-अर्चना संपन्न होती है।
🌳 5 पीढ़ियों पुरानी अनोखी परंपरा: रक्षाबंधन पर ही होते हैं बलदाऊ जी के दुर्लभ दर्शन
बिहारी जी सरकार मंदिर में सावन के पूरे महीने में झूले सजाए जाते हैं और विशेष तिथियों पर अलग-अलग मनमोहक झांकियां सजाई जाती हैं। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि पूरे सावन महीने में जो दर्शन नहीं होते, वे रक्षाबंधन के दिन होते हैं। बड़े महाराज दयाल दास जी द्वारा शुरू की गई पांच पीढ़ी पुरानी इस परंपरा के मुताबिक, रक्षाबंधन (पूर्णिमा) के दिन बलदाऊ जी विशेष रूप से प्रकट होते हैं और झूले पर बैठे छोटे भाई कन्हैया से कहते हैं कि अब महीनाभर हो गया है, हमें अपने दूसरे कार्य भी देखने चाहिए, इसलिए अब घर चलना चाहिए।
🙏 भक्तों की अटूट आस्था: सावन के झूलों का होता है अनूठा समापन
बचपन से इस मंदिर से जुड़ीं श्रद्धालु संगीता बताती हैं कि वे हर साल रक्षाबंधन के अवसर पर इस पारंपरिक दृश्य की गवाह बनने आती हैं। बुंदेलखंड अपनी माटी की अनूठी संस्कृति और लोक-परंपराओं के लिए देशभर में प्रसिद्ध है, और सागर के इस मंदिर की यह प्रथा उसी सांस्कृतिक धरोहर का एक जीवंत हिस्सा है। सावन के आखिरी दिन यानी रक्षाबंधन पर जब बलदाऊ जी कन्हैया को लेने आते हैं, तो इस भव्य और भावनात्मक पल के दर्शन के लिए मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ता है।
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