1879 में बना जबलपुर का ऐतिहासिक बलदाऊ मंदिर, मराठा वास्तुकला और महल जैसी भव्यता है इसकी पहचान

जबलपुर में 1879 में बना ऐतिहासिक बलदाऊ मंदिर मराठा शैली की अनूठी मिसाल है। यहाँ भगवान बलराम को भैंस के दूध और माखन का विशेष भोग लगाया जाता है।

Sep 02, 2026 - 16:39
0
1879 में बना जबलपुर का ऐतिहासिक बलदाऊ मंदिर, मराठा वास्तुकला और महल जैसी भव्यता है इसकी पहचान

भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई दाऊजी यानी भगवान बलराम के देश में गिने-चुने ही मंदिर देखने को मिलते हैं, जिनमें मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर स्थित ऐतिहासिक बलदाऊ मंदिर का विशेष धार्मिक और स्थापत्य महत्व है। छोटे फव्वारा क्षेत्र के पास स्थित इस प्राचीन मंदिर का निर्माण कार्य वर्ष 1879 में प्रसिद्ध व्यवसायी सेठ अबीरचंद द्वारा करवाया गया था। मध्य प्रदेश में इस शैली का दूसरा मंदिर केवल पन्ना जिले में ही स्थित है। यह पूरा मंदिर किसी आलीशान राजमहल की तरह नजर आता है, जिसकी अद्भुत मराठा वास्तुकला और भव्यता आज भी डेढ़ सौ साल बाद देखने वालों को मंत्रमुग्ध कर देती है।

🪵 डेढ़ सौ साल पुराने लकड़ी के दरवाजे और लाल पत्थरों की बारीक नक्काशी, मंदिर परिसर में है बड़ी गौशाला

इतिहासकार आनंद राणा के अनुसार, इस भव्य मंदिर का निर्माण पूरी तरह मराठा वास्तुकला के आधार पर किया गया है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर दो बड़ी मीनारें और बीच में एक सुंदर झरोखा इसकी खूबसूरती में चार चांद लगाता है। यहाँ आज भी डेढ़ सौ साल पुराने प्राचीन दरवाजे सुरक्षित लगे हुए हैं। मंदिर का फर्श उसी दौर के तराशे गए पत्थरों से तैयार किया गया है और इसके ठीक बीच में एक फव्वारा भी बना हुआ है। गर्भगृह में भगवान बलराम की प्रतिमा काले पाषाण (पत्थर) से सुसज्जित है। इस प्राचीन मंदिर की विशेषता यह है कि इसके ठीक पीछे एक विशाल गौशाला का निर्माण भी किया गया था, जहाँ आज भी गायों की सेवा की जाती है।

🥛 गाय का नहीं बल्कि भैंस के दूध और माखन का लगता है भोग, हलषष्ठी और बलराम जयंती पर उमड़ती है भीड़

भगवान बलराम को मुख्य रूप से खेती-किसानी, पशुधन और प्रकृति संरक्षण का देवता माना जाता है, इसलिए हलषष्ठी (हरछठ) और बलराम जयंती पर यहाँ विशेष हल और कृषि औजारों की पूजा होती है। मंदिर के पुजारी सावन शर्मा बताते हैं कि यहाँ की परंपराओं में बलदाऊ को सामान्य दूध की बजाय भैंस के शुद्ध दूध और माखन का विशेष भोग अर्पित किया जाता है। महाकौशल क्षेत्र में इकलौते इस ऐतिहासिक मंदिर में सालभर सभी प्रमुख पर्व मनाए जाते हैं, लेकिन जन्माष्टमी और होली का उत्सव यहाँ बेहद भव्य रूप में आयोजित होता है, जहाँ संतान की सुख-समृद्धि की कामना को लेकर महिलाएँ प्रकृति से जुड़े पेड़-पौधों और उत्पादों के साथ विधि-विधान से व्रत व पूजन करती हैं।

What's Your Reaction?

Like Like 0
Dislike Dislike 0
Love Love 0
Funny Funny 0
Wow Wow 0
Sad Sad 0
Angry Angry 0

Comments (0)

User