पाकिस्तान में गहराया गंभीर खाद्य संकट, महंगाई के कारण लोगों की थाली से गायब हुआ पौष्टिक भोजन
पाकिस्तान में आर्थिक संकट और बेकाबू महंगाई के कारण लोगों की खाने की आदतें बदल गई हैं। खाद्य असुरक्षा का दायरा बढ़कर 24 फीसदी के पार पहुँच गया है।
पड़ोसी देश पाकिस्तान में जारी गंभीर आर्थिक संकट और आसमान छूती महंगाई का असर अब सीधे आम नागरिकों की थाली पर साफ दिखाई देने लगा है। स्थिति यह हो गई है कि पाकिस्तानियों को अब पहले की तुलना में कम भोजन करना पड़ रहा है और उनके खाने की गुणवत्ता में भी भारी गिरावट आई है, क्योंकि परिवारों के लिए अब बाजार से जरूरतभर का राशन खरीदना भी असंभव सा होता जा रहा है। कुछ साल पहले पाकिस्तान में आए गेहूं संकट के दौरान सोशल मीडिया पर #BhookaNangaPakistan जैसे ट्रेंड्स चर्चा में आए थे, और अब एक बार फिर देश में विकराल खाद्य संकट गहराता हुआ नजर आ रहा है।
📉 खाद्य असुरक्षा का ग्राफ हुआ खतरनाक, 2019 के मुकाबले 2025 में परिवारों की मुश्किलें कई गुना बढ़ीं
पाकिस्तान ब्यूरो ऑफ स्टैटिस्टिक्स (PBS) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, पिछले छह वर्षों के दौरान देश के शहरी और ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों में प्रमुख खाद्य श्रेणियों की खपत में भारी गिरावट दर्ज की गई है। परिवारों की घटती क्रय शक्ति का सीधा असर रोजमर्रा की खान-पान की आदतों पर पड़ा है। लोग अब रोटियों का आकार छोटा करने लगे हैं, घरों में मांस (मीट) बनने की आवृत्ति घट गई है, बच्चों के हिस्से का दूध कम हो गया है और यहाँ तक कि रोजाना पिए जाने वाले चाय के कपों की संख्या में भी कटौती करनी पड़ रही है। सामाजिक संकेतकों के मुताबिक, वर्ष 2019 में जहां 15.92 फीसदी परिवार मध्यम से गंभीर खाद्य असुरक्षा की श्रेणी में थे, वहीं 2025 तक यह आंकड़ा बढ़कर सीधे 24.35 फीसदी तक पहुँच गया है।
🌾 देश में अनाज की कोई कमी नहीं, असली समस्या महंगाई और घटती क्रय शक्ति
इस भीषण संकट का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि पाकिस्तान में खाद्यान्न का उत्पादन पूरी तरह बंद नहीं हुआ है। देश में आज भी बड़े पैमाने पर गेहूं, चावल, पोल्ट्री, अंडे और दूध का उत्पादन होता है, यहाँ तक कि मांस का निर्यात भी किया जाता है। इसके बावजूद आम जनता भूखी सोने को मजबूर है, क्योंकि असली समस्या उत्पादन की नहीं बल्कि आसमान छूती कीमतें और लोगों की घटती कमाई है। महंगाई ने गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों का पूरा बजट बिगाड़ दिया है, जिसके चलते लोग अपनी बुनियादी जरूरतों को कम करने के लिए सबसे पहले खाने-पीने की मात्रा और पौष्टिकता से समझौता कर रहे हैं। यदि समय रहते हालात नहीं सुधरे, तो कुपोषण और भुखमरी का यह संकट देश को और बड़ी तबाही की ओर धकेल सकता है।
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