दो कमरों के इस स्कूल में 80% बच्चे रहते हैं उपस्थित, ग्रामीण संस्कृति से जुड़कर बढ़ रहा बच्चों का आत्मविश्वास
धार जिले के खंडीगारा शासकीय प्राथमिक विद्यालय में अनोखे तरीकों से पढ़ाई कराई जा रही है। बिना होमवर्क के दबाव के बच्चों को खेल-खेल में संस्कार और शिक्षा दी जा रही है।
मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित खंडीगारा का शासकीय प्राथमिक विद्यालय पारंपरिक सरकारी स्कूलों की छवि को पूरी तरह से बदल रहा है। इस स्कूल में बच्चों के चेहरे पर पढ़ाई या होमवर्क का कोई तनाव नहीं बल्कि कुछ नया सीखने का उत्साह दिखाई देता है। मात्र दो कमरों में संचालित होने वाले इस विद्यालय में 65 बच्चे अध्ययनरत हैं, जहाँ तीन समर्पित शिक्षिकाएं—नीतू दुबे, चंदनबाला कुमावत और रानी राठौर—किताबों के ज्ञान के साथ-साथ बच्चों में संस्कार, रचनात्मकता और असीम आत्मविश्वास की अलख जगा रही हैं। यहाँ महज दो महीने पहले स्कूल आए पहली कक्षा के नौनिहाल भी अक्षरों की पहचान के साथ शुद्ध संस्कृत के श्लोक सुनाने लगे हैं।
🧘 सुबह की प्रार्थना से लेकर योग तक, खेल-खेल में बच्चों को सिखाई जा रही जिम्मेदारी
विद्यालय में दिन की शुरुआत सुबह 10 बजे योग, प्राणायाम और प्रार्थना से होती है। इसके बाद बच्चे हनुमान चालीसा और संस्कृत के श्लोकों का सस्वर पाठ करते हैं। बच्चों में मंच का डर खत्म करने के लिए उन्हें प्रतिदिन एक नया सुविचार सुनाने का अवसर दिया जाता है। उपस्थिति दर्ज कराने का तरीका भी यहाँ बेहद दिलचस्प है; शिक्षिकाओं ने माचिस की खाली डिब्बियों पर बच्चों की तस्वीरें और नाम चस्पा किए हैं, जिन्हें देखकर बच्चा खुद अपनी हाजिरी लगाता है। यह छोटी सी गतिविधि बच्चों में आत्मनिर्भरता और जिम्मेदारी का भाव पैदा कर रही है। इसके अलावा, विद्यालय में बच्चों पर होमवर्क का बोझ नहीं डाला जाता, बल्कि सारा काम स्कूल परिसर में ही रचनात्मक तरीकों से पूरा कराया जाता है।
🌱 जन्मदिन से लेकर बगिया तक: संस्कृति और पर्यावरण से जुड़ रहे नौनिहाल
इस स्कूल की खूबी सिर्फ पढ़ाई तक सीमित नहीं है, बल्कि यहाँ हर गतिविधि में एक अपनापन झलकता है। बच्चों के जन्मदिन सामूहिक रूप से मनाए जाते हैं और परिसर में पौधे लगाकर एक सुंदर बगिया तैयार की गई है, जिनकी देखभाल बच्चे खुद करते हैं। ग्रामीण परिवेश और संस्कृति से जोड़े रखने के लिए स्कूल की दीवारों पर रंग-बिरंगे पोस्टर और फर्श पर मांडने बनवाने जैसी कलात्मक गतिविधियाँ कराई जाती हैं। सीमित संसाधनों और मात्र दो कमरों के बावजूद इस स्कूल में 80 प्रतिशत बच्चों की नियमित उपस्थिति और अभिभावकों का बढ़ता भरोसा यह साबित करता है कि यदि शिक्षक बच्चों को पढ़ाने के बजाय उन्हें समझें, तो दो कमरों का यह स्कूल भी किसी बड़े आसमान जैसी उड़ान बन सकता है।
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