बहुओं और बेटियों को पढ़ाया, दुबई तक फैलाया जलवा—जानिए क्यों कहलाता है यह 'शिक्षकों का गांव'

बुरहानपुर का बंभाड़ा गांव 'शिक्षकों का गांव' कहलाता है, जहां हर दूसरे घर में टीचर हैं। 350 से अधिक शिक्षक-शिक्षिकाएं देश-विदेश में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

Sep 05, 2026 - 10:30
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बहुओं और बेटियों को पढ़ाया, दुबई तक फैलाया जलवा—जानिए क्यों कहलाता है यह 'शिक्षकों का गांव'

मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले में एक ऐसा अनूठा गांव बसा है, जहाँ हर दूसरे घर में आपको कोई न कोई शिक्षक मिल जाएगा। शिक्षक दिवस के इस पावन अवसर पर हम आपको बंभाड़ा गांव के उन प्रेरणादायक शिक्षकों की कहानी बता रहे हैं, जिन्होंने न केवल अपने गांव की शैक्षणिक तस्वीर पूरी तरह बदलकर रख दी, बल्कि पूरे मध्य प्रदेश को आदर्श शिक्षकों की एक बड़ी फौज दी है। बंभाड़ा गांव के करीब 350 शिक्षक और शिक्षिकाएं वर्तमान में प्रदेश सहित देश और दुनिया के विभिन्न हिस्सों में अपनी उत्कृष्ट सेवाएं प्रदान कर रहे हैं, जिससे पूरे क्षेत्र का नाम रोशन हुआ है।

📚 साल 1976 में आई थी शिक्षा की क्रांति, एसके बांगड़े ने जलाई थी ज्ञान की अलख

स्थानीय ग्रामीणों के मुताबिक, करीब 50 साल पहले तक इस गांव के लोग शिक्षा की मुख्यधारा से कोसों दूर थे और अधिकतर लोग अशिक्षित जीवन यापन करते थे। लेकिन साल 1976 में एसके बांगड़े नामक एक समर्पित शिक्षक इस गांव में पहुँचे, जिन्होंने लोगों को शिक्षा का असली महत्व समझाया और बच्चों के साथ-साथ बड़ों में भी ज्ञान की अलख जगाई। इसके बाद से धीरे-धीरे पूरा गांव शिक्षा से जुड़ता चला गया। इस गांव की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ बहुओं और बेटियों को पढ़ाई के समान अवसर दिए गए, जिसके परिणामस्वरुप आज यहाँ 100 से अधिक महिला शिक्षिकाएं सरकारी और निजी स्कूलों में नौनिहालों का भविष्य संवार रही हैं।

🌍 दुबई तक पहुंचा गांव के शिक्षकों का जलवा, महिला सशक्तिकरण की जीती-जागती मिसाल बना बंभाड़ा

इस गांव के मेधावी युवाओं ने वैश्विक स्तर पर भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। बंभाड़ा के सुधीर महाजन वर्तमान में दुबई के एक इंटरनेशनल स्कूल में बतौर प्राचार्य (Principal) अपनी सेवाएं दे रहे हैं, वहीं प्रमोद लक्ष्मण महाजन को शिक्षा के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और देश की पूर्व उपराष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। शिक्षिका हर्षा नीलेश चौधरी बताती हैं कि मायके के बाद ससुराल में भी उन्हें आगे पढ़ने का पूरा प्रोत्साहन मिला, जिसके चलते वे आज एक सफल शिक्षिका हैं। यह गांव आज रूढ़िवादी सोच को पीछे छोड़कर महिला सशक्तिकरण का एक जीवंत और अनुकरणीय उदाहरण बन चुका है।

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