सहारनपुर में प्राचीन मस्जिद गिराए जाने पर मौलाना अरशद मदनी ने जताया दुख, उठाए गंभीर सवाल

सहारनपुर कलेक्ट्रेट स्थित प्राचीन मस्जिद को गिराए जाने पर जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने गहरा दुख जताते हुए प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल खड़े किए हैं।

Sep 05, 2026 - 19:33
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सहारनपुर में प्राचीन मस्जिद गिराए जाने पर मौलाना अरशद मदनी ने जताया दुख, उठाए गंभीर सवाल

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने उत्तर प्रदेश के सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित एक प्राचीन मस्जिद को सुबह करीब 5 बजे गिराए जाने की घटना पर गहरा दुख और रोष व्यक्त किया है। मौलाना मदनी ने इस कार्रवाई को लेकर देश के सामने एक बुनियादी सवाल खड़ा करते हुए कहा है कि क्या संविधान और कानून का पालन हर नागरिक और हर धर्म के लिए सचमुच एक समान है? उन्होंने कहा कि यदि संविधान सभी को समानता, धार्मिक स्वतंत्रता और कानून के समान संरक्षण का अधिकार देता है, तो इस तरह की कार्रवाइयों में दोहरा मापदंड क्यों नजर आता है?

📜 पूजा स्थल अधिनियम और वक्फ बोर्ड पंजीकरण का उठाया मुद्दा

मौलाना मदनी ने अपने बयान में स्पष्ट किया कि सहारनपुर की यह घटना केवल एक मस्जिद का मामला नहीं है, बल्कि यह संविधान की सर्वोच्चता, कानून के शासन और राज्य की निष्पक्ष भूमिका से जुड़ा हुआ अत्यंत संवेदनशील विषय है। उन्होंने कहा कि 1991 का पूजा स्थल अधिनियम आज भी प्रभावी है, और नए वक्फ कानून के तहत 'वक्फ बाई यूजर' की धारा के साथ-साथ इस मस्जिद का वक्फ बोर्ड में पंजीकरण (नंबर 451) भी है। इसके अलावा, यह जमीन मूल रूप से याकूब खान और वहीद खान के नाम से दर्ज है, ऐसे में यह कार्रवाई किस न्याय के तहत की गई, यह बड़ा सवाल है।

⚖️ "देश किसी एक धर्म का नहीं, हम सिर्फ समान न्याय की मांग कर रहे हैं"

विशेष समुदाय को निशाना बनाए जाने का आरोप लगाते हुए मौलाना मदनी ने सवाल किया कि यदि अवैध कब्जा ही कार्रवाई का पैमाना है, तो देश भर के विभिन्न हिस्सों में दशकों से मौजूद अन्य धार्मिक निर्माणों के खिलाफ भी ऐसी ही सख्ती क्यों नहीं बरती जाती? उन्होंने बताया कि मस्जिद कमेटी की ओर से अदालत में 1911 के दस्तावेज, नगरपालिका रिकॉर्ड और राजस्व अभिलेख पेश किए गए थे, जिनसे यह साबित होता था कि कलेक्ट्रेट की वर्तमान इमारत से पहले से यह मस्जिद वहां मौजूद है। अंत में उन्होंने कहा कि भारत सभी धर्मों और आस्थाओं का साझा देश है, और वे सरकार से कोई विशेष रियायत नहीं बल्कि केवल 'समान न्याय' की मांग करते हैं।

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