11 देशों वाले विस्तृत BRICS में क्या अमेरिका के दबाव को बेअसर कर पाएंगे तीन बड़े दिग्गज?
नई दिल्ली में आयोजित BRICS शिखर सम्मेलन में पीएम मोदी, शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन का महाजुटान हो रहा है। जानिए 11 देशों के इस संगठन की ताकत, सीमा विवाद, डी-डॉलरलाइजेशन और अमेरिका के प्रभाव पर इसका असर।
जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन नई दिल्ली में एक साथ मंच पर आ रहे हैं, तो वैश्विक पटल पर सबसे अहम तस्वीर इन तीनों नेताओं के हाथ मिलाने की बन रही है। तियानजिन में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन में हुई इनकी चर्चित मुलाकात के बाद, ये तीनों दिग्गज अब एक ऐसे विस्तृत ब्रिक्स (BRICS) मंच पर मिल रहे हैं जो पहले की तुलना में अधिक व्यापक है, लेकिन राजनीतिक रूप से बंटा हुआ भी नजर आ रहा है।
इस शिखर सम्मेलन पर अमेरिकी दबाव साफ तौर पर देखा जा रहा है। शी जिनपिंग सात वर्षों में पहली बार भारत दौरे पर हैं, वहीं पुतिन अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बीच रूस के बाहर किसी प्रमुख शिखर सम्मेलन में भाग ले रहे हैं। दूसरी ओर, प्रधानमंत्री मोदी पश्चिम के साथ मजबूत रणनीतिक साझेदारी बनाए रखते हुए इन दोनों पड़ोसियों के साथ संतुलन साधने की कोशिश में हैं।
🌍 एक बड़ा ब्रिक्स, जिसे संभालना चुनौती: 11 सदस्यों के साथ 49% वैश्विक आबादी का प्रतिनिधित्व
ब्रिक्स का सफर 2001 में अर्थशास्त्री जिम ओ’नील द्वारा दिए गए एक एक्रोनिम से शुरू होकर आज दुनिया के सबसे बड़े आर्थिक व कूटनीतिक संगठनों में से एक बन चुका है। ब्राजील, रूस, भारत और चीन के 2009 में बने इस समूह में 2011 में दक्षिण अफ्रीका और 2024 में मिस्र, इथियोपिया, ईरान व UAE शामिल हुए। 2025 में इंडोनेशिया भी इसका हिस्सा बना।
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जनसांख्यिकी व अर्थव्यवस्था: 11 सदस्यों का यह बढ़ा हुआ समूह दुनिया की लगभग 49% आबादी, 39% वैश्विक जीडीपी (GDP) और 23% अंतरराष्ट्रीय व्यापार का प्रतिनिधित्व करता है।
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संगठनात्मक सीमाएं: विशाल दायरे के बावजूद ब्रिक्स की कोई स्थायी संधि, सचिवालय या साझा बजट नहीं है और सभी फैसले आम सहमति से होते हैं।
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आंतरिक मतभेद: मई 2026 में नई दिल्ली में हुई विदेश मंत्रियों की बैठक में ईरान और UAE के बीच उपजे क्षेत्रीय मतभेदों के कारण कोई संयुक्त बयान जारी नहीं हो सका था, जो इसकी काम करने की सीमा को दर्शाता है।
⚖️ तीन बड़ी ताकतों का अलग-अलग नजरिया: रूस, चीन और भारत के अपने रणनीतिक हित
मॉस्को, बीजिंग और नई दिल्ली के इस मंच को देखने के नजरिए बिल्कुल अलग हैं:
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रूस (मॉस्को): पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद रूस गैर-पश्चिमी बाजारों, ऊर्जा निर्यात और वैकल्पिक पेमेंट सिस्टम पर पूरी तरह निर्भर है। भारत के साथ द्विपक्षीय व्यापार को 2030 तक 100 अरब डॉलर पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है।
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चीन (बीजिंग): चीन ब्रिक्स का उपयोग पश्चिमी-संचालित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और डॉलर के प्रभुत्व (Hegemony) को चुनौती देने के लिए एक बड़े राजनयिक उपकरण के रूप में कर रहा है।
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भारत (नई दिल्ली): भारत ब्रिक्स को चीन-रूस नीत 'अमेरिका-विरोधी' गुट बनने से बचाना चाहता है। भारत के लिए यह मंच क्वाड (Quad), G20 और यूरोप के साथ रिश्तों के साथ-साथ अपनी 'रणनीतिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) बनाए रखने का एक साधन है।
🏔️ भारत-चीन संबंधों की परीक्षा: सीमा पर शांति और व्यापारिक संतुलन पर टिकी नजरें
2020 में गलवान घाटी की हिंसक झड़प के बाद ठंडे पड़े भारत-चीन संबंधों में अक्टूबर 2024 के 'डिसइंगेजमेंट' (सेना पीछे हटाने) समझौते के बाद सुधार की शुरुआत हुई थी।
शी जिनपिंग का यह दिल्ली दौरा दोनों देशों के बीच संबंधों को स्थिर करने का अवसर दे सकता है। भारत ने सीधी उड़ानें शुरू करने, वीजा नियमों में ढील देने और निवेश संबंधी पाबंदियों को आसान बनाने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। हालांकि, वित्त वर्ष 2024-25 में चीन से 113.5 अरब डॉलर के आयात और रिकॉर्ड 99.2 अरब डॉलर के व्यापार घाटे को देखते हुए भारत अपनी आर्थिक और रणनीतिक सुरक्षा को लेकर पूरी तरह सतर्क है।
💵 डॉलर के प्रभुत्व पर सवाल: रिज़र्व करेंसी नहीं, लोकल करेंसी और पेमेंट नेटवर्क पर जोर
BRICS की अपनी कोई साझा करेंसी नहीं है और न ही डॉलर को रातों-रात रिप्लेस करने की कोई योजना है। इसके बजाय, यह संगठन व्यावहारिक विकल्पों पर ध्यान दे रहा है:
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लोकल करेंसी ट्रेड: सदस्य देश आपस में अपनी-अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं (National Currencies) में व्यापार का निपटारा कर रहे हैं।
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डिजिटल पेमेंट इंटरऑपरेबिलिटी: भारत ब्रिक्स देशों के सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC) और यूपीआई जैसे पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर को आपस में जोड़ने पर जोर दे रहा है ताकि सीमा-पार लेनदेन तेजी से और कम लागत पर हो सके।
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न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB): 2015 में स्थापित NDB अब तक 139 इंफ्रास्ट्रक्चर और ग्रीन एनर्जी प्रोजेक्ट्स के लिए 42.9 बिलियन डॉलर मंजूर कर चुका है, जिसमें अकेले भारत के 32 प्रोजेक्ट्स (9.53 बिलियन डॉलर) शामिल हैं।
🌐 अमेरिकी दबाव और बहुध्रुवीय विश्व की ओर बढ़ता कदम
रूस से तेल आयात को लेकर भारत पर अमेरिकी दबाव रहा है, वहीं चीन अमेरिका का मुख्य प्रतिद्वंद्वी है। हालांकि, ब्रिक्स के बाकी सदस्य (जैसे सऊदी अरब, UAE, ब्राजील और इंडोनेशिया) अमेरिका से सीधे टकराव के बजाय एक संतुलित नीति अपना रहे हैं।
नई दिल्ली शिखर सम्मेलन में नेताओं का एक साथ हाथ मिलाना केवल कूटनीतिक प्रदर्शन नहीं है, बल्कि यह उभरती बहुध्रुवीय दुनिया (Multipolar World) का प्रतीक है। हालांकि, इस मुलाकात की असली सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या 11 देश घोषणापत्रों से आगे बढ़कर वास्तविक सीमा स्थिरता, सुगम भुगतान प्रणालियों और ठोस संस्थागत ढांचों का निर्माण कर पाते हैं।
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