Dr. B.D. Chaurasia: छतरपुर के किसान के बेटे, जिन्हें दुनिया कहती है 'एनाटॉमी का गॉडफादर'; पढ़ें सफलता की कहानी

जानें छतरपुर के डॉ. बी.डी. चौरसिया के बारे में, जिन्हें 'एनाटॉमी का जनक' कहा जाता है। उनकी सरल भाषा की किताबों ने दुनिया भर के मेडिकल छात्रों को डॉक्टर बनने में मदद की।

Jun 25, 2026 - 15:55
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Dr. B.D. Chaurasia: छतरपुर के किसान के बेटे, जिन्हें दुनिया कहती है 'एनाटॉमी का गॉडफादर'; पढ़ें सफलता की कहानी

छतरपुर। मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले का चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में विशेष गौरवशाली इतिहास है। यहां बारीगढ़ नामक एक छोटे से कस्बे में जन्मे भगवानदीन चौरसिया (डॉ. बी.डी. चौरसिया) को आज दुनिया 'ह्यूमन एनाटॉमी का गॉडफादर' मानती है। एक साधारण किसान परिवार से निकलकर उन्होंने चिकित्सा क्षेत्र में ऐसा योगदान दिया कि आज भी MBBS की पढ़ाई करने वाला हर छात्र उनकी किताबों के बिना अधूरा है।

📖 मेडिकल छात्रों के लिए वरदान बनीं सरल किताबें

स्व. डॉ. बी.डी. चौरसिया द्वारा लिखी गई किताबें गरीब और जरूरतमंद छात्रों के लिए किसी वरदान से कम नहीं हैं। 70 के दशक में, जब तकनीक का अभाव था, तब उन्होंने जटिल एनाटॉमी विषय को बेहद सरल भाषा, पहेलियों, कविताओं और आकर्षक फ्लोचार्ट के माध्यम से पेश किया। उनकी मेहनत का ही परिणाम है कि आज उनकी किताबें न केवल भारत में, बल्कि इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया और पूरे एशिया में चिकित्सा की पढ़ाई का मुख्य आधार बनी हुई हैं।

✍️ हाथ से बनाए नोट्स और सेवा भाव

डॉ. चौरसिया की महानता इसी बात से झलकती है कि उन्होंने अपनी शिक्षा और ज्ञान को केवल पैसे कमाने का जरिया नहीं बनाया। उस दौर में जब टाइपिंग और फोटोकॉपी महंगी थी, वे अपने हाथ से बनाए गए नोट्स को खुद साइक्लोस्टाइल मशीन से प्रिंट करवाते थे और छात्रों को नाममात्र के शुल्क (महज 10 रुपये) पर उपलब्ध कराते थे। उन्होंने जीवनभर अविवाहित रहकर खुद को पूर्णतः मेडिकल शिक्षा और समाज के नाम समर्पित कर दिया था।

🏛️ चिकित्सा जगत में अमर नाम

डॉ. बी.डी. चौरसिया ने एनाटॉमी के विभिन्न पहलुओं पर 60 से अधिक पुस्तकें लिखीं। 5 मई 1985 को 47 वर्ष की अल्पायु में उनका निधन हो गया, लेकिन उनका नाम चिकित्सा जगत में हमेशा के लिए अमर हो गया। आज भी छतरपुर के बारीगढ़ में उनकी समाधि स्थल पर कार्तिक माह में मेला लगता है, जो उनके प्रति ग्रामीणों के अपार प्रेम और सम्मान को दर्शाता है। छतरपुरवासी अब यह मांग कर रहे हैं कि स्थानीय मेडिकल कॉलेज का नाम डॉ. बी.डी. चौरसिया के नाम पर रखा जाए ताकि आने वाली पीढ़ियां उनके त्याग और योगदान से प्रेरित हो सकें।

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