Rewa Mystery: रीवा का रहस्यमयी 'महिषासुर कुंड'; जहाँ तांत्रिक क्रियाओं से दूर होते हैं भूत-प्रेत और मिलते हैं प्राचीन साक्ष्य
रीवा के गोविंदगढ़ स्थित महिषासुर कुंड का रहस्य। क्या यहाँ भूत-प्रेत का साया और तांत्रिक क्रियाएं होती हैं? जानें इस दिव्य स्थल और दुर्लभ सोमवल्ली का सच।
रीवा। रीवा शहर से लगभग 20 किलोमीटर दूर गोविंदगढ़ के घने और खामोश जंगलों के बीच एक ऐसा स्थान स्थित है, जो सदियों से रहस्यों के आगोश में है। इसे 'महिषासुर कुंड' या 'भैंसासुर कुंड' के नाम से जाना जाता है। लोकमान्यताओं के अनुसार, यह स्थान केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि तंत्र-मंत्र और दिव्य शक्तियों का संगम भी माना जाता है। यहाँ की दुर्गम पगडंडियाँ और सन्नाटा इसे और भी रहस्यमयी बना देते हैं।
👹 तंत्र क्रिया 'जापन' और प्रेत बाधा से मुक्ति
विशेषज्ञों और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, जब किसी व्यक्ति पर नकारात्मक ऊर्जा या भूत-प्रेत का साया होता है, तो तांत्रिक 'जापन' नामक विशेष तंत्र क्रिया करते हैं। मंत्रोच्चारण के जरिए पीड़ित के शरीर से नकारात्मक ऊर्जा को अलग कर उसे इसी कुंड में हमेशा के लिए दफन या प्रवाहित कर दिया जाता है। हजारों वर्षों से चली आ रही इस परंपरा के कारण आज भी कुंड के पास चूड़ियाँ, बिंदी, डोरी और अन्य सामग्री बिखरी हुई मिलती है।
🌿 दुर्लभ औषधि 'सोमवल्ली' का निवास
इस कुंड की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ पाई जाने वाली दुर्लभ जड़ी-बूटी 'सोमवल्ली' (सोमलता) है। शास्त्रों में वर्णित इस औषधि का उपयोग देवतागण अपनी आयु बढ़ाने के लिए करते थे। विशेषज्ञ नेपाल सिंह के अनुसार, इसकी सात प्रजातियों में से एक प्रजाति इस कुंड के आसपास मौजूद है। यह स्थान न केवल आस्था, बल्कि औषधीय महत्व की दृष्टि से भी शोध का विषय है।
📜 प्राचीन लिपियाँ और अदृश्य बर्तन
महिषासुर कुंड से जुड़ी कई किवदंतियाँ प्रचलित हैं। कहा जाता है कि सदियों पहले यहाँ कुंड से बर्तन निकलते थे, जिनका उपयोग राहगीर भोजन पकाने में करते थे। इसके अलावा, यहाँ की चट्टानों पर हज़ारों वर्ष पुरानी लिपियाँ उकेरी गई हैं, जिनके रंग आज भी ताज़ा प्रतीत होते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह समूचा क्षेत्र किसी बड़े पुरातत्व शोध की माँग करता है, जिसे अब तक अनदेखा किया गया है।
🌑 श्रद्धा या अंधविश्वास?
जहाँ एक ओर इस स्थान पर लोगों की गहरी आस्था है, वहीं दूसरी ओर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इसका कोई प्रमाण अब तक नहीं मिला है। पुरातत्व विभाग और विश्वविद्यालय के कई विशेषज्ञों से इस विषय पर चर्चा की गई, लेकिन अब तक कोई आधिकारिक शोध नहीं हो पाया है। आज भी सैकड़ों लोग प्रेत बाधा से मुक्ति के लिए यहाँ 9 दिन का 'जागर' बैठाते हैं। क्या यह कुंड वाकई कोई अलौकिक शक्ति समेटे हुए है, या यह केवल लोककथाओं का हिस्सा है? यह प्रश्न आज भी अनसुलझा है।
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