मप्र के स्कूलों में शिक्षकों के 1.15 लाख पद खाली; हाई कोर्ट ने राज्य और केंद्र सरकार को थमाया नोटिस

मध्य प्रदेश की बदहाल शैक्षणिक व्यवस्था पर हाई कोर्ट सख्त। 1.15 लाख शिक्षकों के पद खाली, जर्जर स्कूलों और सुविधाओं के अभाव पर शासन से 17 अगस्त तक मांगा जवाब।

Jul 01, 2026 - 19:09
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मप्र के स्कूलों में शिक्षकों के 1.15 लाख पद खाली; हाई कोर्ट ने राज्य और केंद्र सरकार को थमाया नोटिस

सेंधवा                                         दिनांक 01.07.2026
म.प्र.राज्य में 16 जुन से नवीन शैक्षणिक सत्र प्रारम्भ हो चुका है लेकिन यहां के विद्यार्थीयो को वर्तमान मे मूलभूत एवं बुनियादी सुविधाऐं भी नही मिल पा रही है। इसी गंभीर मुद्दे को लेकर म.प्र. उच्च न्यायालय की इंदौर खण्डपीठ मे दायर जनहित याचिका की सुनवाई पश्चात् न्यायमुर्ति सुबोध अभ्यंकर एवं न्यायमुर्ति आलोक अवस्थी की बैंच ने राज्य एवं केन्द्र शासन को सुचना पत्र जारी कर 17 अगस्त 2026 तक जवाब तलब किया है। 
सेंधवा के सामाजिक कार्यकर्ता एवं अधिवक्ता बी.एल.जैन द्वारा प्रस्तुत जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान यािचकाकर्ता के अधिवक्ता अभिषेक तुगनावत ने न्यायालय को बताया कि वर्तमान में प्रदेश में 40 प्रतिशत शिक्षकों के पद रिक्त है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 45 के तहत शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 मे 6 से 14 वर्ष की आयु के प्रत्येक बच्चे को मुफ्त और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा को प्रदान करने की जिम्मेदारी राज्यो को दी गई है। लेकिन प्रदेश शासन की वर्तमान व्यवस्थाऐं हमारे देश के नौनिहालो के भविष्य के प्रति गंभीर नही है जिससे बच्चो के मौलिक अधिकारो का खुला उल्लंघन हो रहा है। न्यायालय को बताया गया कि देष की आजादी के 79 वर्षो के बाद भी प्रदेश की शैक्षणिक व्यवस्था संतोषजनक नही है। भारत के नियत्रंक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की वर्ष 2025 की रिपोर्ट जो म.प्र. विधानसभा में फरवरी 2026 मे प्रस्तुत की गई उसके मुताबिक प्रदेश की शिक्षा की गुणवत्ता बिगड़ने के साथ बुनियादी ढंाचा भी ध्वस्थ नजर आया । प्रदेश में 2 लाख 89 हजार शिक्षकों के पद स्वीकृत है इसमे 1 लाख 15 हजार 678 पद रिक्त है। प्रदेश के 83 हजार 514 स्कलो में से 5 हजार स्कुलो के भवन बच्चो के लिये सुरिक्षत नहीं होकर जर्जर है यही नहीं 3 हजार 400 स्कुलो मे शौचालय भी नही है। 10 हजार स्कुल तो ऐसे है जहां बिजली की सुविधाएं भी नहीं है। 1895 स्कुले तो ऐसी है जहां 1 भी शिक्षक नहीं है। 40 हजार स्कुलो में सुरक्षा के लिये बाउंड्रीवाल भी नहीं है। हजारो स्कुलो मे शुद्ध पेय जल भी उपलब्ध नहीं है। अनेक स्कुले तो झोपडियो में संचालित हो रही है। डिजीटल इंण्डिया की बात करने वाले प्रदेश के 59 हजार स्कुलो में कम्प्युटर की सुविधा भी उपलब्ध नही है अनगिनत समस्याओ के बीच चैकाने वाला आंकड़ा यह है कि पिछले 10 वर्षो में 1ली से 12वीं तक में 22 लाख 3 हजार विद्यार्थियो की कमी शासकीय स्कुलो में दर्ज की गई है जबकि इन 10 वर्षाे में जनसख्ंया मे बढ़ोतरी हुई है। याचिकाकर्ता द्वारा न्यायालय को बताया गया कि ये आंकड़े दर्शाते है कि प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था में जबरजस्त गिरावट आई हैै। देश की सर्वोच्च अदालत ने जनवरी 2026 मे निर्देशित किया है कि देश के प्रत्येक स्कुल चाहे वह निजी हो शासकीय बच्चियो के लिये मुफ्त सेनेटरी पेड एवं छात्र-छात्राओ के लिये पृथक-पृथक टायलेट होना जरूरी है। इन निर्देशों का पालन नहीं करने पर संबंधित स्कुल के खिलाफ कार्यवाही की जावेगी।  एक ओर तो प्रदेश सरकार बजट की 16 प्रतिशत राशि यानी 50 हजार लाख करोड़ की राशि मुफ्त की योजनाओ में खर्च कर रही है वहीं षिक्षा एवं स्वास्थ्य जैसी मूलभूत एवं बुनियादी सुविधाओ पर खर्च करने के लिये खजाना खाली नजर आता है। कमीशनखोरी के कारण मरम्मत एवं नवीन निर्माण कार्यो में भ्रष्टाचार की जड़े गहरी होने के कारण करोड़ो रूपये की शासकीय निधि का दुरूपयोग हो रहा है दिखावे के लिये कुछ लोगों के खिलाफ निलबंन की कार्यवाही कर दी जाती है लेकिन ठोस कार्यवाही के अभाव में भ्रष्टाचार की यह बेल निरंतर फल-फुल रही है। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता द्वारा न्यायालय के समक्ष प्रदेश के नौनिहालो के सुनहरे भविष्य के लिये एवं संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारो के पालन को सुनिष्चित करवाने की गुहार लगाई गई है। सुनवाई पश्चात् न्यायालय ने केन्द्र एवं राज्य सरकार को 17 अगस्त तक जवाब प्रस्तुत करने हेतु सुचना पत्र जारी किये है।

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