27 साल बाद भी ताजा हैं कारगिल की यादें; ग्वालियर के शहीद सूबेदार नरेंद्र सिंह राणा की अमर गाथा
कारगिल विजय दिवस पर जानिए ग्वालियर के शहीद सूबेदार नरेंद्र सिंह राणा का अमर बलिदान। कारगिल युद्ध के बाद कुपवाड़ा में देश की रक्षा करते हुए शहीद हुए सूबेदार राणा की आखिरी चिट्ठी और उनके परिवार के संघर्ष की पूरी कहानी पढ़ें।
ग्वालियर। भारत-पाकिस्तान के बीच हुए कारगिल युद्ध में भारतीय सेना की ऐतिहासिक विजय को 27 वर्ष पूरे होने जा रहे हैं. 3 मई 1999 को शुरू हुआ यह भीषण युद्ध 26 जुलाई 1999 को पाकिस्तान की शर्मनाक हार के साथ समाप्त हुआ था. इस जीत के पीछे देश के 527 वीर जवानों का सर्वोच्च बलिदान है. इन्हीं अमर शहीदों की स्मृति में हर साल 26 जुलाई को 'कारगिल विजय दिवस' मनाया जाता है. इन वीरों में ग्वालियर के सपूत सूबेदार नरेंद्र सिंह राणा भी शामिल हैं, जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए.
ग्वालियर के घोसीपुरा इलाके में आर्मी बाउंड्री के ठीक सामने एक साधारण सा घर है. यह घर किसी आम नागरिक का नहीं, बल्कि कारगिल युद्ध के अमर शहीद सूबेदार नरेंद्र सिंह राणा का है, जहां आज भी उनकी पत्नी यशोदा देवी और तीनों बेटे रहते हैं.
शहीद का बड़ा बेटा मध्य प्रदेश पुलिस में सब इंस्पेक्टर है, दूसरा बेटा नगर निगम में आउटसोर्स कर्मचारी है और तीसरा बेटा एक निजी कंपनी में कार्यरत है. परिवार में वित्तीय स्थिरता होने के बावजूद घर के मुखिया का न होना आज भी सभी को खलता है.
सूबेदार नरेंद्र सिंह राणा का जन्म ग्वालियर के मुरार स्थित घोसीपुरा गांव में 12 दिसंबर 1955 को हुआ था. सैन्य छावनी क्षेत्र के समीप रहने के कारण उनमें बचपन से ही सेना में भर्ती होने का जुनून था. महज 21 वर्ष की आयु में वे भारतीय थल सेना में शामिल हो गए.
12 जुलाई 1976 को ड्यूटी जॉइन करने के बाद उन्हें 4 राष्ट्रीय राइफल्स (4 RR) में पोस्टिंग मिली. उन्होंने राजस्थान से लेकर जम्मू-कश्मीर तक देश की सीमाओं पर पूरी निष्ठा के साथ अपनी सेवाएं दीं.
शहीद सूबेदार के बेटे मृगेंद्र सिंह राणा ने बताया कि कारगिल युद्ध के दौरान उनके पिता की तैनाती जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा मोर्चे पर थी. 26 जुलाई को भारत ने पाकिस्तान को हराकर युद्ध में आधिकारिक जीत की घोषणा कर दी थी. हालांकि, इसके बाद भी सीमा पार से पाकिस्तानी सैनिकों की ओर से छिटपुट हमले जारी रहे.
ऐसे ही एक हमले का मुंहतोड़ जवाब देते हुए 5 अगस्त 1999 की रात सूबेदार नरेंद्र सिंह राणा देश की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए. 6 अगस्त की सुबह सेना द्वारा परिवार को उनकी शहादत की सूचना दी गई और उसी शाम उनका पार्थिव शरीर पैतृक गांव लाया गया.
अमर शहीद और उनके परिवार से जुड़ा मुख्य विवरण नीचे दी गई तालिका में समझा जा सकता है:
| विवरण / मापदंड | आधिकारिक जानकारी व मुख्य बिंदु |
| नाम एवं पद | शहीद सूबेदार नरेंद्र सिंह राणा |
| सैन्य टुकड़ी (Regiment) | 4 राष्ट्रीय राइफल्स (4 RR) |
| जन्म तिथि व स्थान | 12 दिसंबर 1955 (घोसीपुरा, ग्वालियर) |
| सेना में सेवा में प्रवेश | 12 जुलाई 1976 |
| शहादत की तिथि व स्थान | 5 अगस्त 1999 (कुपवाड़ा, जम्मू-कश्मीर) |
| परिवार | पत्नी यशोदा देवी, 3 पुत्र (बड़ा बेटा MP पुलिस में SI) |
शहीद की पत्नी यशोदा देवी बताती हैं कि उस दौर में संपर्क का एकमात्र साधन चिट्ठियां हुआ करती थीं. शहादत से ठीक पहले सूबेदार राणा ने घर के लिए एक आखिरी पत्र पोस्ट किया था.
अमर शहीद के सम्मान में ग्वालियर के मुरार क्षेत्र में उनके नाम से एक भव्य स्मृति द्वार का निर्माण कराया गया. हालांकि, शहादत के बाद शहीद परिवार को लंबे समय तक आर्थिक और सामाजिक संघर्षों से गुजरना पड़ा. अनुकंपा योजना के तहत विशेष सरकारी नियुक्ति के लिए परिवार को 12 वर्षों का लंबा इंतजार करना पड़ा.
वर्तमान में उनका बड़ा बेटा विशेष नियुक्ति के तहत मध्य प्रदेश पुलिस में सीआईडी सब इंस्पेक्टर (CID SI) के पद पर दतिया में सेवाएं दे रहा है. परिवार का कहना है कि सरकार की ओर से मिलने वाली कोई भी सहायता शहीद मुखिया के खालीपन को कभी नहीं भर सकती.
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