Chhatarpur News: जाति-सूचक नाम के कारण 'सामाजिक दंश' झेल रहे ग्रामीण, गांव का नाम सुनते ही लौट जाते हैं रिश्ते वाले
छतरपुर के चमरुवा पुरवा सहित कई गांवों के जाति-सूचक नाम से दलित समाज परेशान। रोजगार और रिश्तों में आ रही दिक्कतें। प्रशासन से नाम बदलने की गुहार।
छतरपुर। देश की आजादी के दशकों बाद भी छतरपुर के कई गांव और पुरवे आज भी जाति-सूचक नामों का दंश झेल रहे हैं। इन गांवों में रहने वाला दलित समुदाय आज भी समाज की मुख्य धारा से जुड़ने में संघर्ष कर रहा है। 'चमरुवा पुरवा' जैसे गांवों के निवासियों का कहना है कि नाम के कारण उन्हें न केवल सामाजिक उपेक्षा का सामना करना पड़ता है, बल्कि रोजगार और वैवाहिक संबंधों में भी भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।
🚕 नाम सुनते ही सवारी ले जाने से मना करते हैं ऑटो-रिक्शा वाले
ग्रामीणों के अनुसार, स्थिति इतनी खराब है कि गांव का नाम सुनते ही बाहर के लोग हीन भावना से देखते हैं। चमरुवा पुरवा के निवासी और जनपद सदस्य दलपत अहिरवार बताते हैं कि उनके बच्चे जब स्कूल में दाखिला लेते हैं या कहीं रोजगार के लिए जाते हैं, तो गांव का नाम बताने पर उन्हें अपमानित होना पड़ता है। यहां तक कि ऑटो और रिक्शा वाले भी इस गांव का नाम सुनकर सवारी छोड़ने से इनकार कर देते हैं। लड़कियों के रिश्ते आने में भी गांव का नाम एक बड़ी बाधा बना हुआ है।
⚖️ प्रशासनिक उदासीनता और ग्रामीणों की गुहार
ग्रामीणों ने कई बार कलेक्टर और तहसीलदार को आवेदन देकर गांव का नाम बदलने की मांग की, लेकिन अब तक कोई सुनवाई नहीं हुई है। एडवोकेट देवेंद्र अनुरागी का कहना है कि न केवल गांव, बल्कि सरकारी स्कूलों के नाम भी जाति-सूचक हैं, जो पुराने सामाजिक ढांचे और भेदभाव को आज भी जीवित रखे हुए हैं। उन्होंने सामाजिक समरसता के लिए इन नामों को तुरंत बदलने की मांग की है।
🏢 क्या कहते हैं जिला प्रशासन के अधिकारी?
मामले पर छतरपुर जिला पंचायत सीईओ नमःशिवाय अरजरिया का कहना है कि नाम बदलने की प्रक्रिया के लिए ग्राम पंचायत को ग्राम सभा में प्रस्ताव पारित कर संकल्प तैयार करना होता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि पंचायत की ओर से फाइल उनके पास आती है, तो प्रशासन नाम परिवर्तन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए उचित कदम उठाएगा।
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