रतलाम में आम के पेड़ों पर संकट: अचानक सूख रहे हैं सैकड़ों साल पुराने पेड़, जानिए क्या है वजह?

रतलाम में आम के पेड़ अचानक सूखने से किसान चिंतित। विशेषज्ञों ने फंगस, स्टेम बोरर और जल स्तर में गिरावट को बताया कारण। पढ़ें पेड़ों को बचाने के उपाय।

Jun 12, 2026 - 22:51
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रतलाम में आम के पेड़ों पर संकट: अचानक सूख रहे हैं सैकड़ों साल पुराने पेड़, जानिए क्या है वजह?

रतलाम। रतलाम के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में पुराने आम के पेड़ों के अचानक सूखने का सिलसिला चिंता का विषय बना हुआ है। कभी आम के बगीचों के लिए प्रसिद्ध रहे सेमलिया जैसे गांवों में अब गिने-चुने पेड़ ही बचे हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, पिछले दो सालों में बड़ी संख्या में पेड़ देखते ही देखते काल के गाल में समा गए हैं।

 पेड़ों के सूखने की भयावह स्थिति

सेमलिया गांव के नरेंद्र जैन बताते हैं कि उनके ट्रस्ट की जमीन पर कभी 100 से ज्यादा आम के पेड़ हुआ करते थे, जिनमें से अब केवल एक दर्जन ही शेष हैं। केवल मई-जून के दो महीनों में ही 4 पेड़ सूख गए। वहीं, नवीन व्यास ने बताया कि शहर में भी यही हाल है; घर के बाहर छाया देने वाला वर्षों पुराना पेड़ महज 2-3 दिनों में ही सूखकर नष्ट हो गया। ऐसी ही स्थिति रामलाल मौर्य और भावेश राठौर के खेतों में भी देखी गई है।

 विशेषज्ञ क्यों मान रहे इसे गंभीर समस्या?

उद्यानिकी विशेषज्ञ शैतान सिंह गरवाल के अनुसार, इसके पीछे प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:

  • फंगस और दीमक: जड़ों में संक्रमण के कारण पेड़ को पोषण नहीं मिलता।

  • स्टेम बोरर: यह कीड़ा तने में छेद कर उसे खोखला कर देता है।

  • भू-जल संकट: पर्यावरण विशेषज्ञ खुशाल सिंह पुरोहित का मानना है कि मालवा में भू-जल स्तर लगातार गिरने से जमीन की नमी कम हो रही है, जो पेड़ों के स्वास्थ्य पर बुरा असर डाल रही है।

 कैसे बचाएं अपने वर्षों पुराने आम के पेड़?

विशेषज्ञों ने पेड़ों को बचाने के लिए कुछ प्रभावी सुझाव दिए हैं:

  • छेद की जांच: तने में छेद या लाल गोंद दिखे तो क्लोरोपायरीफोस का उपयोग करें और छेद को मिट्टी से बंद कर दें।

  • तने की पुताई: नीला थोथा, चूना और कॉपर ऑक्सिक्लोराइड के घोल से तने की पुताई करें।

  • छंटाई: सूखी और रोगग्रस्त टहनियों को तुरंत काटकर हटा दें।

  • सिंचाई: पेड़ के घेरे (रिंग) के आधार पर व्यवस्थित सिंचाई करें, लेकिन जलभराव न होने दें।

समय रहते सही उपचार और उचित देखरेख के जरिए मालवा की इस अमूल्य धरोहर को बचाया जा सकता है। प्रशासन और किसानों को मिलकर इस दिशा में त्वरित कदम उठाने की आवश्यकता है।

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