भारत हर महीने बना रहा है हजारों तोप के गोले, पश्चिमी देशों को सप्लाई कर रहा रक्षा सामग्री
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप ने गोला-बारूद और विस्फोटक बनाने की तैयारी तेज कर दी है। भारत भी इसमें अपनी अहम भूमिका निभा रहा है।
रूस-यूक्रेन युद्ध और दुनियाभर में लगातार बढ़ते सैन्य तनाव के बाद अब अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप के प्रमुख देश बड़े पैमाने पर गोला-बारूद और विस्फोटक बनाने की तैयारी में पूरी तरह जुट गए हैं। इन पश्चिमी देशों का मुख्य मकसद दूसरे देशों पर अपनी रक्षात्मक निर्भरता को कम करना और किसी भी युद्ध की विकट स्थिति में अपने ही देश के भीतर पर्याप्त हथियार और गोला-बारूद तैयार करना है। 'वॉल स्ट्रीट जर्नल' की एक रिपोर्ट के मुताबिक, नाटो (NATO) देशों में इस समय कम से कम 24 नए प्रोजेक्ट्स पर तेजी से काम चल रहा है, जिसके तहत नए प्रोपेलेंट (गोला दागने वाला मुख्य केमिकल) और आधुनिक विस्फोटक बनाने वाली फैक्ट्रियों का निर्माण किया जा रहा है।
🏭 अमेरिका में दशकों बाद बन रही हैं नई प्रोपेलेंट फैक्ट्रियां
संयुक्त राज्य अमेरिका में वर्तमान में केवल एक ही प्रोपेलेंट फैक्ट्री चालू हालत में है। यह पुरानी फैक्ट्री दूसरे विश्व युद्ध के दौरान वर्जीनिया राज्य में बनाई गई थी, और इसके बाद 1970 के दशक के बाद से अमेरिका में कोई भी नई प्रोपेलेंट फैक्ट्री नहीं बनाई गई थी।
लेकिन अब हालात बदलते हुए अमेरिका के आर्कान्सस राज्य में तीन नई फैक्ट्रियां स्थापित की जा रही हैं। इनमें रेगुलस ग्लोबल, डीएंडएम होल्डिंग और दक्षिण कोरिया की प्रतिष्ठित कंपनी हानव्हा डिफेंस शामिल हैं। इसमें से रेगुलस कंपनी साल 1986 के बाद पहली बार अमेरिका की धरती पर ट्रिपल-बेस प्रोपेलेंट का उत्पादन दोबारा शुरू करेगी। वहीं दूसरी ओर, भारत की प्रमुख डिफेंस कंपनी कल्याणी स्ट्रैटेजिक सिस्टम्स हर महीने भारी मात्रा में गोला-बारूद का निर्माण कर रही है और कंपनी ने अपनी उत्पादन क्षमता को और अधिक बढ़ाने का बड़ा फैसला लिया है।
💣 यूरोप में बनेंगी 3 नई TNT फैक्ट्रियां और ब्रिटेन की योजना
यूरोप भी अपनी सैन्य और रक्षा क्षमताओं को बेहद तेजी से बढ़ाने में जुटा हुआ है। इसके तहत यूरोप में तीन बिल्कुल नई टीएनटी (TNT) फैक्ट्रियां बनाई जा रही हैं। अमेरिका में भी कई दशकों के लंबे अंतराल के बाद एक बार फिर से टीएनटी का घरेलू उत्पादन शुरू होने जा रहा है।
इसके अलावा, ब्रिटेन सरकार ने वर्ष 2030 तक अपने देश में कम से कम छह नई आधुनिक विस्फोटक फैक्ट्रियां स्थापित करने की महत्वाकांक्षी योजना तैयार की है। शीत युद्ध (Cold War) के समाप्त होने के बाद अमेरिका और यूरोप के तमाम देशों ने अपने रक्षा बजट में भारी कटौती कर दी थी। इस वजह से कई पुरानी गोला-बारूद और विस्फोटक बनाने वाली फैक्ट्रियां बंद हो गईं और इस क्षेत्र का पूरा उत्पादन एशिया समेत अन्य देशों में शिफ्ट हो गया था।
📉 आयात पर निर्भरता और युद्ध के कारण बढ़ी कीमतें
साल 1978 के दौर में अकेले अमेरिका के पास लगभग 32 सरकारी गोला-बारूद प्लांट हुआ करते थे, लेकिन आज घटकर केवल 11 ही बचे हैं। इसी तरह, यूरोप में पहले कुल 7 टीएनटी फैक्ट्रियां थीं, जो घटकर अब सिर्फ एक ही रह गई हैं। अमेरिका आज भी अपनी जरूरत के टीएनटी के लिए पूरी तरह से आयात पर निर्भर है, जिसका एक बहुत बड़ा हिस्सा पोलैंड से सप्लाई होता है।
रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान पश्चिमी देशों की यह बड़ी सामरिक कमजोरी खुलकर सामने आ गई। पोलैंड की प्रमुख कंपनी 'नाइट्रो-केम' ने अपने अमेरिकी ग्राहकों को स्पष्ट रूप से बता दिया कि युद्ध जैसे हालातों के कारण वह अब रेगुलर सप्लाई की पूरी गारंटी नहीं दे सकती। इस संकट के बाद से साल 2024 से टीएनटी की वैश्विक कीमतों में लगभग चार गुना तक की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई। वहीं दूसरी ओर, अमेरिका में आरडीएक्स (RDX) और आईएमएक्स (IMX) जैसे आधुनिक विस्फोटकों का उत्पादन बढ़ाने की योजना भी अपनी तय समयसीमा से करीब आठ साल पीछे चल रही है, और अब इसके साल 2030 तक पूरी तरह पूरा होने की उम्मीद जताई जा रही है।
🇮🇳 पश्चिमी देशों को विस्फोटक सामग्री सप्लाई करता है भारत
इस बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत भी अपनी रक्षा तैयारियों को बेहद तेजी से धार दे रहा है। कल्याणी स्ट्रैटेजिक सिस्टम्स के सीईओ नीलेश तुंगर के अनुसार, उनकी कंपनी हर महीने लगभग 60 हजार तोप के गोले तैयार कर रही है और अब इन गोलों में इस्तेमाल होने वाले जरूरी केमिकल्स का प्रोडक्शन भी बड़े पैमाने पर बढ़ाने की योजना पर काम चल रहा है।
भारत वर्तमान में पश्चिमी देशों को विस्फोटक सामग्री की नियमित सप्लाई करता है, हालांकि टीएनटी जैसे कुछ विशिष्ट केमिकल्स के मामले में देश अभी पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं बन पाया है। तुंगर का कहना है कि पहले के समय में सैन्य तैयारियां अमूमन 40 दिन तक चलने वाले युद्ध को ध्यान में रखकर की जाती थीं, लेकिन रूस-यूक्रेन के वर्तमान युद्ध ने पूरी दुनिया को यह दिखा दिया है कि आधुनिक युद्ध लंबे समय तक खिंच सकते हैं। यही एक मुख्य वजह है जिसके चलते अब अमेरिका, यूरोप और भारत समेत दुनिया के कई प्रमुख देश अपने यहां गोला-बारूद और बारूद का उत्पादन तेजी से बढ़ाने की होड़ में जुटे हैं।
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