सावन में हरियाली अमावस्या का विशेष महत्व, शतावर और महुआ की डगाल लगाकर करते हैं फसल की रक्षा
शहडोल में आदिवासी समाज द्वारा हरियाली अमावस्या के दिन प्रकृति और फसलों की विशेष पूजा की जाती है। जानिए इस पर्व का महत्व और पारंपरिक अनुष्ठान।
शहडोल: मध्य प्रदेश के शहडोल जिले में आदिवासी समुदाय की समृद्ध संस्कृति और परंपराओं में हमेशा से प्रकृति के संरक्षण और संवर्धन की गहरी सीख मिलती है। जनजातीय समाज जल, जंगल और जमीन को अपने जीवन का मुख्य आधार मानता है। उनकी सामाजिकता और आपसी जुड़ाव का संदेश हर त्योहार में स्पष्ट रूप से झलकता है, क्योंकि प्रकृति के संरक्षण में ही आदिवासी समुदाय अपना जीवन पूरी तरह सुरक्षित मानता है।
अब सावन माह की शुरुआत हो चुकी है और आदिवासियों के लिए सावन में आने वाली 'हरियाली अमावस्या' का विशेष और धार्मिक महत्व होता है। इस दिन आदिवासी समाज के बीच विशेष प्रकृति पूजा की प्राचीन परंपरा है, जहाँ फसलों की विशेष रूप से पूजा की जाती है, घरों में लजीज पकवान बनाए जाते हैं और रात के वक्त सामूहिक नृत्य के साथ इस पर्व को बहुत उल्लास से मनाया जाता है। इस साल हरियाली अमावस्या 12 अगस्त को है।
🌾 फसलों के मध्य पहुंचकर प्रकृति की विशेष पूजा करने की परंपरा
आदिवासी संस्कृति के गहरे जानकार चांद सिंह पट्टावी बताते हैं कि, ''हरियाली अमावस्या आदिवासी समाज के बीच बहुत बड़ा स्थान रखती है। चूँकि हरियाली अमावस्या सावन के पवित्र महीने में आती है, इसलिए इसका महत्व और अधिक बढ़ जाता है। इस दिन आदिवासी समाज के लोग पूरी तरह पवित्र मन से किसी नदी या तालाब में स्नान करते हैं, स्वच्छ कपड़े पहनकर सीधे खेतों में जाते हैं और खरीफ सीजन की लहलहाती फसलों के बीच बैठकर विशेष प्रकृति पूजा करते हैं।''
🌳 फसलों के बीच स्थापित किए जाते हैं तीन विशेष पेड़ों के डगाल
इस पारंपरिक प्रकृति पूजा के तहत आदिवासी समुदाय के लोग तीन अलग-अलग पेड़ों के छोटे-छोटे डगाल (डालियां) खेत के बीच में बहुत ही श्रद्धा के साथ स्थापित करते हैं। इसके पीछे उनका एक विशेष उद्देश्य होता है। जिन पेड़ों की डालियां लगाई जाती हैं, उनमें मुख्य रूप से एक 'शतावर' का पेड़, दूसरा 'भेलमा' का पेड़ और तीसरा 'महुआ' का पेड़ शामिल होता है।
इन तीनों ही पेड़ों का जनजातीय समाज के बीच बहुत ऊंचा और पवित्र स्थान माना गया है। समाज की ऐसी मान्यता है कि शतावर का पेड़ आम जनमानस के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत गुणकारी है और यह सदियों से आदिवासियों के बीच प्रसिद्ध रहा है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि शतावर का पेड़ लगभग 100 तरह के रोगों को दूर करने की अद्भुत क्षमता रखता है।
🛡️ फसलों की सुरक्षा और बेहतर उत्पादन के लिए अनोखी मान्यता
चांद सिंह पट्टावी आगे बताते हैं कि, ''शतावर के पेड़ की छोटी डगाल जब फसलों के बीच लगाई जाती है, तो इसके पीछे यह मान्यता होती है कि उनकी फसल हर तरह के कीटों और रोगों से सुरक्षित रहे। इसी प्रकार भेलमा के पेड़ की डगाल भी खेतों के बीच स्थापित की जाती है, जिसके बारे में यह विश्वास है कि भेलमा के पेड़ में किसी भी प्रकार का रोग नहीं लगता है, यानी उनकी फसल भी पूरी तरह से निरोगी और सुरक्षित बनी रहे।''
इसके अलावा, महुआ के पेड़ की एक डगाल भी खेत में लगाई जाती है। इसके महत्व को समझाते हुए वे कहते हैं कि, ''जैसे महुआ का पेड़ हर विपरीत परिस्थिति में—चाहे भारी बारिश हो या न हो, आंधी आए या तूफान आए—अपनी पूरी मजबूती से खड़ा रहता है और हर साल उसमें फल-फूल आते हैं, ठीक उसी तरह महुआ की डगाल को खेतों के बीच लगाकर वे भगवान से प्रार्थना करते हैं कि उनकी फसल भी मौसम की हर विपरीत परिस्थिति को झेलते हुए बंपर और बेहतर उत्पादन दे।''
🏛️ आदिवासियों के जीवन में महुआ के पेड़ का सर्वोच्च स्थान
चांद सिंह पट्टावी के अनुसार, आदिवासी समाज के बीच महुआ के पेड़ को 'बड़ा देव' (मुख्य भगवान) का स्थान दिया गया है। एक तरह से वे अपने आराध्य देव को ही खेतों के बीच स्थापित और विराजमान मानते हैं, जो उनकी पूरी फसल की रक्षा करते हैं। इन सभी पेड़ों की छोटी-छोटी डालियों को विधि-विधान से खेत में गाड़कर विशेष पूजा-अर्चना की जाती है, और अंत में प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त किया जाता है। यही वजह है कि हरियाली अमावस्या का यह पर्व आदिवासी समाज में काफी धूमधाम से मनाया जाता है।
🍲 कृषि कार्यों पर विराम और विशेष पकवानों के साथ सामूहिक नृत्य
इस खास दिन पर पारंपरिक रूप से हर तरह के कृषि कार्यों पर पूरी तरह रोक (ब्रेक) होती है। चाहे कुछ भी हो जाए, जनजातीय समाज के लोग इस दिन किसी भी प्रकार का खेती-किसानी का कार्य नहीं करते हैं। हल और जुआ जैसी चीजें, जो पहले खेती के मुख्य साधन हुआ करती थीं (हालांकि अब आधुनिक मशीनरी का दौर आ चुका है), उनकी भी इस दिन विशेष रूप से पूजा की जाती है।
इसके अलावा, सभी लोग अपने घरों में अपनी आर्थिक स्थिति और सुविधा के अनुसार स्वादिष्ट पकवान व अच्छे भोजन तैयार करते हैं। परिवार और समाज के लोग मिलकर इसका सेवन करते हैं और रात के समय सभी लोग एकत्र होकर पारंपरिक सामूहिक नृत्य करते हैं तथा इस दिन को बहुत ही खुशी और उल्लास के साथ मनाते हैं।
✨ इस साल की हरियाली अमावस्या का ज्योतिषीय और धार्मिक महत्व
ज्योतिषाचार्य पंडित सुशील शुक्ला शास्त्री बताते हैं कि, ''इस वर्ष 12 अगस्त को हरियाली अमावस्या पड़ रही है। इस बार हरियाली अमावस्या के पावन अवसर पर कई दुर्लभ शुभ योग भी एक साथ बन रहे हैं। इस दिन व्यतिपात योग, मातंग योग, पिथौरा व्रत, स्नान-दान अमावस्या और पुण्यतमा अमावस्या का बेहद खास संयोग एक साथ मिल रहा है।''
पारंपरिक रूप से भी इस अमावस्या के दिन लोग पवित्र नदियों या तालाबों में जाकर स्नान करते हैं, और बहुत सारे जातक इस दिन विशेष रूप से पूजा-पाठ करते हैं। बहते जल में स्नान करने का इस दिन विशेष धार्मिक महत्व माना गया है। कोई पवित्र नदी में डुबकी लगाता है, कोई तालाब जाता है तो कोई माँ गंगा के तट पर पहुँचता है। इस दिन कई लोग भगवान शिव (शंकर जी) की भी विशेष आराधना करते हैं, यही कारण है कि हिंदू धर्म और संस्कृति में इस अमावस्या को बेहद पुण्यदायी माना गया है।
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