एसएनसीयू टीम की मेहनत लाई रंग, बेहद कम वजन के साथ पैदा हुई बच्ची ने जीता जीवन का संघर्ष
रतलाम के एमसीएच अस्पताल की एसएनसीयू टीम ने महज 860 ग्राम (घटकर 690 ग्राम) वजन के साथ जन्मी प्रीमैच्योर बच्ची को 2 महीने के कठिन इलाज के बाद पूरी तरह स्वस्थ कर नया जीवन दिया है।
रतलाम: मध्य प्रदेश के रतलाम जिला अस्पताल की एसएनसीयू (SNCU) टीम ने चिकित्सा जगत में एक बार फिर नामुमकिन को मुमकिन करके दिखाया है। यहाँ 25 सप्ताह की बेहद प्रीमैच्योर डिलीवरी के दौरान पैदा हुई एक नवजात बच्ची को अत्यंत गंभीर और नाजुक अवस्था में अस्पताल में भर्ती करवाया गया था। जन्म के समय उस मासूम बच्ची का वजन मात्र 860 ग्राम ही था।
इतना ही नहीं, शुरुआती इलाज के दौरान बच्ची का वजन और घटकर न्यूनतम 690 ग्राम तक ही रह गया था। बच्ची के फेफड़े भी पूरी तरह से विकसित नहीं थे और उसे सांस लेने में भारी दिक्कत हो रही थी। लेकिन रतलाम एसएनसीयू की पूरी टीम ने दिन-रात अथक मेहनत कर इस नवजात को एक नया जीवन दान दिया है। करीब दो महीने के लंबे और कड़े प्रयासों के बाद अब बच्ची पूरी तरह स्वस्थ है और उसे अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया है।
⚖️ जन्म के समय सिर्फ 860 ग्राम था वजन, फेफड़े भी नहीं थे विकसित
प्राप्त जानकारी के अनुसार, आलोट तहसील के अंतर्गत आने वाले सागर पाड़ा गांव की रहने वाली महिला दीपिका (पति अनिल) की डिलीवरी तय समय से काफी पहले यानी महज 25 सप्ताह में ही हो गई थी। जन्म लेने के बाद इस गंभीर रूप से अस्वस्थ नवजात बच्ची को रतलाम एमसीएच (MCH) स्थित एसएनसीयू यूनिट में लाया गया, जहाँ गंभीर और कमजोर नवजात बच्चों का विशेष उपचार किया जाता है।
सिविल सर्जन डॉ. एपी सिंह ने इस सफलता के बारे में बताते हुए कहा कि, ''करीब दो महीने पहले जब इस नवजात बच्ची को अस्पताल में भर्ती कराया गया था, तब उसका वजन केवल 860 ग्राम था। इसके अलावा, नवजात के फेफड़े पूर्ण रूप से विकसित नहीं हो पाए थे, जिसकी वजह से उसे सांस लेने में अत्यधिक कठिनाई, शॉक और बहुत ज्यादा कम वजन की गंभीर समस्या का सामना करना पड़ रहा था।''
🫁 बार-बार रुक रही थी सांस, सीपैप मशीन और प्रोटोकॉल से शुरू हुआ इलाज
हमारे अस्पताल के शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रतीक आर्या के नेतृत्व में एसएनसीयू के सभी डॉक्टरों और कुशल नर्सिंग स्टाफ ने मिलकर इस नवजात बच्ची का विशेष चिकित्सा प्रोटोकॉल के तहत तुरंत ट्रीटमेंट शुरू किया।
शुरुआत में नवजात को लगातार 15 दिनों तक सीपैप (CPAP) मशीन की सहायता से ऑक्सीजन सपोर्ट पर रखा गया। इसके बाद धीरे-धीरे नेजल प्रॉन्स और ऑक्सीजन हुड के माध्यम से ऑक्सीजन प्रदाय की गई। इस पूरी उपचार प्रक्रिया के दौरान बच्ची को बार-बार 'एपनिया' यानी सांस रुकने की खतरनाक समस्या भी हुई, जिसका डॉक्टरों ने अपनी सूझबूझ से सफलतापूर्वक निदान किया।
🤱 कंगारू मदर केयर (KMC) की दी गई ट्रेनिंग, बढ़कर 1400 ग्राम हुआ वजन
चूंकि नवजात को प्रीमैच्योरिटी एनीमिया की समस्या भी हो गई थी, इसलिए उसका ब्लड ट्रांसफ्यूजन (खून चढ़ाना) भी किया गया। बच्ची की मां को विशेष देखरेख और 'कंगारू मदर केयर' (Kangaroo Mother Care) के लिए पूरी तरह प्रशिक्षित किया गया।
शुरुआती 15 दिनों तक बच्ची को नली के जरिए दूध पिलाया गया, जिसके बाद धीरे-धीरे बच्ची को मां के द्वारा प्राकृतिक मिल्क फीडिंग कराई जाने लगी। करीब दो महीने की कड़ी मेहनत और देखरेख के बाद बच्ची पूरी तरह स्वस्थ हो गई, और अस्पताल से छुट्टी (डिस्चार्ज) देते समय उसका वजन बढ़कर स्वस्थ 1400 ग्राम हो चुका था।
👨👩👧 माता-पिता बोले—डॉक्टरों और स्टाफ की बदौलत हमारी बच्ची को मिला नया जीवन
जिला अस्पताल की एसएनसीयू यूनिट के डॉक्टर प्रतीक आर्या ने बताया कि, ''यहाँ की पूरी मेडिकल टीम की सामूहिक और दिन-रात की मेहनत से ही यह चमत्कार संभव हो पाया है।''
वहीं, नवजात के माता-पिता दीपिका और अनिल ने अत्यंत भावुक होकर बताया कि, ''जब हमारी बच्ची पैदा हुई थी, तो उसकी हालत बेहद नाजुक थी और हम उसे गंभीर अवस्था में यहाँ लेकर आए थे। यहाँ के सभी डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ ने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी और हमारी बच्ची को एक नया जीवन दिया है।''
बहरहाल, चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि इतने कम वजन और प्रीमैच्योर डिलीवरी में पैदा होने वाले बच्चे आमतौर पर जीवित नहीं रह पाते हैं, और समय पर उचित उपचार न मिलने के कारण वे दम तोड़ देते हैं। लेकिन रतलाम एसएनसीयू यूनिट की बेहतरीन कार्यशैली और सामूहिक प्रयासों ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि सही इलाज से हर जान बचाई जा सकती है।
📖 क्या होती है 'कंगारू मदर केयर' (KMC) तकनीक?
इस बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रतीक आर्या ने बताया कि, ''यह मुख्य रूप से प्रीमैच्योर डिलीवरी में पैदा होने वाले कमजोर नवजात शिशुओं को दी जाने वाली एक बेहद असरदार थेरेपी है।''
इस विधि में माता या पिता नवजात शिशु को अपनी छाती से सटाकर 'स्किन-टू-स्किन टच' (Skin to Skin Touch) देते हुए कुछ घंटों तक अपने पास रखते हैं। इस विशेष विधि से नवजात बच्चे के शरीर का तापमान बिल्कुल स्थिर रहता है और उसका वजन भी तेजी से बढ़ने लगता है। यह ठीक उसी प्राकृतिक तरीके की तरह काम करता है, जिस तरह कंगारू अपने छोटे बच्चे को अपने शरीर पर बनी विशेष थैली में सुरक्षित रखकर पालता है। इसके लिए अस्पताल में प्रसूता माता को विशेष रूप से प्रशिक्षित भी किया जाता है।
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