खरपई गांव में कैंसर पीड़ित की मौत के बाद विवाद, परिजनों को खेत में करना पड़ा अंतिम संस्कार

अलीराजपुर के खरपई गांव में धर्म बदलने के कारण एक व्यक्ति के निधन पर सार्वजनिक मुक्तिधाम में अंतिम संस्कार करने से रोक दिया गया। परिजनों को मजबूरन खेत में अंतिम संस्कार करना पड़ा।

Aug 10, 2026 - 20:00
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खरपई गांव में कैंसर पीड़ित की मौत के बाद विवाद, परिजनों को खेत में करना पड़ा अंतिम संस्कार

मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल अंचल अलीराजपुर से रूढ़िवादी परंपराओं और सामाजिक पंचायतों के तुगलकी फरमानों का एक बेहद अमानवीय मामला सामने आया है, जहाँ मृत्यु के बाद भी एक पीड़ित व्यक्ति का पीछा सामाजिक बहिष्कार ने नहीं छोड़ा। यह ताजा मामला अलीराजपुर जिले के नानपुर क्षेत्र के खरपई गांव का है, जहाँ 45 वर्षीय एक व्यक्ति की मृत्यु के बाद समाज के ठेकेदारों ने उसका सार्वजनिक मुक्तिधाम में अंतिम संस्कार करने पर रोक लगा दी। मृतक का केवल इतना ही 'दोष' था कि उसने अपनी पारंपरिक आदिवासी जीवनशैली को छोड़कर एक अन्य धर्म अपना लिया था। इस अमानवीय विरोध के चलते दुखी परिजनों को मजबूर होकर अपने ही खेत में मृतक का अंतिम संस्कार करना पड़ा।

🎗️ कैंसर से लंबी जंग और सामाजिक बहिष्कार का सामना करने वाला बोंदर सिंह

खरपई गांव के रहने वाले 45 वर्षीय बोंदर सिंह पिछले काफी समय से गंभीर बीमारी यानी कैंसर से पीड़ित थे और अंततः बीमारी के चलते उनका निधन हो गया था। लेकिन बीमारी के इस दौर में भी उन्हें मानवीय सहानुभूति के बजाय सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ा। समाज और धर्म की रूढ़िवादी परंपराओं के टकराव तथा पंचायत के कड़े फैसलों की जिद के कारण उनके परिवार को जीते-जी भी और मृत्यु के बाद भी भारी प्रताड़ना झेलनी पड़ी।

🚫 अन्य धर्म अपनाने की सजा: अंतिम विदाई से भी रोका गया

मृतक के बेटे प्रदीप ने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए बताया, "मेरे पिता ने कुछ वर्ष पहले अपनी इच्छा से दूसरा धर्म अपना लिया था, जिसकी प्रार्थना पद्धति और तौर-तरीकों से गांव के कुछ लोगों और समाज को आपत्ति थी। जब पिता की मृत्यु हुई, तब भी गांव के लोगों ने संवेदनशीलता न दिखाते हुए हमें सार्वजनिक मुक्तिधाम में उनका अंतिम संस्कार करने की अनुमति नहीं दी।"

इस मामले में जब गांव के सरपंच और पटेल मानसिंह से बात की गई, तो उनका तर्क था कि "आदिवासी संस्कृति और परंपराओं को नुकसान पहुँचाने के विरोध स्वरूप सामाजिक पंचायत ने बोंदर सिंह की गतिविधियों का विरोध किया था।" दूसरी ओर, इस पूरे मामले पर तहसीलदार मंजू डावर ने जानकारी देते हुए कहा कि "इस संबंध में आधिकारिक रूप से पुलिस थाने या हमारे कार्यालय में कोई लिखित शिकायत दर्ज नहीं कराई गई है। मीडिया के माध्यम से मामला संज्ञान में आने के बाद हम इसकी जमीनी स्तर पर जानकारी ले रहे हैं, और यदि ऐसी कोई अमानवीय घटना वाकई हुई है, तो दोषियों के विरुद्ध नियमानुसार सख्त कार्रवाई की जाएगी।"

⚖️ मानवाधिकार आयोग तक पहुँचा मामला, न्याय की आस में पीड़ित परिवार

कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे बोंदर सिंह की मृत्यु के बाद जहाँ एक तरफ पूरा परिवार गहरे शोक में डूबा हुआ था, वहीं दूसरी तरफ उन्हें गांव के तीखे विरोध और सामाजिक अलगाव का सामना करना पड़ा। अंततः मजबूर होकर परिवार को अपने ही खेत की जमीन पर पिता को अंतिम विदाई देनी पड़ी। इस गंभीर मामले की गंभीरता को देखते हुए पीड़ित पक्ष ने अब मध्य प्रदेश मानवाधिकार आयोग को पत्र लिखकर न्याय की गुहार लगाई है, जिससे प्रशासनिक हलकों में भी हलचल तेज हो गई है।

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