मनमाने तरीके से भर्ती प्रक्रिया रद्द करने पर हाईकोर्ट सख्त, मेरिट के आधार पर नियुक्ति देने के आदेश
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय द्वारा भर्ती प्रक्रिया रद्द करने के आदेश को निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने तीन महीने के भीतर नियुक्ति पत्र जारी करने के निर्देश दिए हैं।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय (RDU) को एक बड़ा झटका लगा है। विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा करीब एक दशक पहले वर्ष 2014 में शुरू की गई तृतीय और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की भर्ती प्रक्रिया को अचानक रद्द किए जाने के फैसले को हाईकोर्ट ने पूरी तरह 'मनमाने' करार देते हुए निरस्त कर दिया है। जस्टिस दीपक खोत की एकल पीठ ने अपने अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि अन्य कोई कानूनी अड़चन नहीं है, तो विश्वविद्यालय प्रशासन को मेरिट सूची के आधार पर चयनित अभ्यर्थियों को आगामी तीन महीने के भीतर नियुक्ति पत्र जारी करना होगा। हाईकोर्ट के इस ऐतिहासिक निर्णय के बाद लंबे समय से न्याय का इंतजार कर रहे युवाओं में एक नई उम्मीद जाग गई है।
🏛️ वर्ष 2014 में जारी हुआ था विज्ञापन, चयन सूची आने के बाद कार्य परिषद ने कर दी थी प्रक्रिया निरस्त
रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय प्रशासन ने तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के पदों पर भर्ती के लिए 27 जून और 18 सितंबर 2014 को आधिकारिक विज्ञापन जारी किया था। इसके बाद अभ्यर्थियों ने लिखित परीक्षा दी और परीक्षा परिणाम घोषित होने के बाद चयन सूची भी सार्वजनिक कर दी गई थी। लेकिन इसके बावजूद विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्य परिषद ने 24 अगस्त 2016 को पूरी चयन प्रक्रिया को ही अचानक रद्द करने का आदेश जारी कर दिया। इस मनमाने फैसले के खिलाफ चयनित उम्मीदवार योगेश चौहान और अन्य साथियों ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में याचिका दायर कर चुनौती दी थी, जिस पर लंबी सुनवाई के बाद यह फैसला आया है।
🔍 हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी—शिकायतों या मात्र आशंका के आधार पर सामूहिक भर्ती रद्द करना अनुचित
हाईकोर्ट की एकलपीठ ने अपने फैसले में टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल कुछ शिकायतों या आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) द्वारा जानकारी मांगे जाने मात्र से यह साबित नहीं हो जाता कि पूरी चयन प्रक्रिया में कोई बड़ा घोटाला या गड़बड़ी हुई थी। विश्वविद्यालय के रिकॉर्ड पर ऐसा कोई भी ठोस सबूत या स्पष्ट कारण मौजूद नहीं था, जिससे पूरी चयन प्रक्रिया को सामूहिक रूप से रद्द करने के फैसले को सही ठहराया जा सके। सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेशों का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि चयन सूची में नाम आने मात्र से नियुक्ति का पूर्ण अधिकार भले न मिला हो, लेकिन यूनिवर्सिटी बिना किसी पुख्ता और ठोस कारण के मनमाने ढंग से पूरी चयन प्रक्रिया को खारिज नहीं कर सकती।
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