दुनिया में सिर्फ दो ही मंदिर, जानिए पन्ना के ऐतिहासिक बलदेव जी मंदिर और 16 कलाओं के रहस्य के बारे में
पन्ना का ऐतिहासिक बलदेव जी मंदिर अपनी अद्भुत वास्तुकला और हलछठ महोत्सव के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। यहाँ बलराम जी का जन्मोत्सव धूमधाम से मनाया जाता है।
मंदिरों की नगरी के रूप में प्रसिद्ध पन्ना जिले में भगवान श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम जी (बलदेव जी) का एक अत्यंत प्राचीन और विश्व प्रसिद्ध ऐतिहासिक मंदिर स्थित है, जो अपने आंचल में सदियों पुराना इतिहास संजोए हुए है। पन्ना के राजवंश परिवार द्वारा बनवाए गए इस भव्य बलदेव जी मंदिर में हरछठ (हलछठ) महोत्सव के पावन पर्व पर भगवान बलदेव जी का जन्मोत्सव अत्यंत हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। यहां चली आ रही परंपरा के अनुसार, राजवंश परिवार के सदस्यों द्वारा भगवान की आरती के समय उन्हें चांवर डुलाई जाती है, जो सदियों से अनवरत रूप से निभाई जा रही है। मंदिर के व्यवस्थापक कुंज बिहारी शर्मा के अनुसार, इस जन्मोत्सव में बुंदेलखंड ही नहीं बल्कि समूचे मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश से हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए पन्ना पहुँचते हैं।
📐 इंजीनियरिंग का अद्भुत नमूना है यह मंदिर: 16 की संख्या पर आधारित है पूरी वास्तुकला और गर्भगृह की विशेषता
भगवान श्री कृष्ण की 16 कलाओं को समर्पित यह मंदिर वास्तुकला और इंजीनियरिंग का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। दुनिया में बलदेव जी के केवल दो ही प्रमुख मंदिर हैं—एक वृंदावन में और दूसरा पन्ना में, जहाँ भगवान बलदेव जी सरकार विराजमान हैं। इस मंदिर की बनावट में '16' अंक का विशेष महत्व झलकता है:
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मंदिर में कुल 16 भव्य पिलर (स्तंभ) बने हुए हैं।
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भवन में 16 खिड़कियाँ और 16 सीढ़ियाँ हैं।
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मंदिर की सजावट में 16 झरोखे मौजूद हैं।
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यहाँ तक कि मंदिर के आंगन में बिछे हुए पाषाण भी 16 की संख्या में हैं।
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इस मंदिर की अद्भुत इंजीनियरिंग का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मंदिर के गर्भगृह से करीब 300 मीटर की दूरी पर मुख्य सड़क गुजरती है, और सड़क पर चलते हुए श्रद्धालु आसानी से ऊंचाई पर विराजमान भगवान बलदेव जी के दर्शन कर सकते हैं।
👑 पन्ना राजघराने के 10वें नरेश ने कराई थी स्थापना, हलछठ पर्व पर महिलाएं रखती हैं संतान की लंबी उम्र का व्रत
पन्ना नगर के बिल्कुल बीचों-बीच स्थित इस विशाल मंदिर का निर्माण पन्ना रियासत के बुंदेला नरेश महाराज रुद्र प्रताप सिंह जूदेव (10वें नरेश) द्वारा 1876 से 1879 के बीच करवाया गया था। लगभग 10 एकड़ के क्षेत्रफल में फैला यह मंदिर पश्चिमी और भारतीय स्थापत्य कला का एक बेजोड़ नमूना है, जिसमें स्थापित शालिग्राम की पावन प्रतिमा महाराज रुद्र प्रताप सिंह स्वयं वृंदावन से लाए थे। हलछठ महोत्सव के इस विशेष अवसर पर सुहागिन महिलाएं अपनी संतान की सुख-समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और लंबी आयु के लिए निर्जला व्रत रखती हैं, जिसमें धरती से जुताई करके उगाए गए अनाजों का सेवन वर्जित होता है तथा फलाहार एवं पारंपरिक नियमों के पालन के साथ व्रत पूर्ण किया जाता है।
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