राम राजा सरकार से पहले कृष्ण नगरी था ओरछा, जानिए वृंदावन से कैसे जुड़ी है पन्ना के जुगलकिशोर मंदिर की कहानी
ओरछा का इतिहास भगवान राम के साथ-साथ भगवान कृष्ण से भी गहरा जुड़ा हुआ है। जानिए कैसे वृंदावन से पन्ना पहुँची जुगलकिशोर जी की प्रतिमा और ओरछा की पौराणिक कहानी।
मध्य प्रदेश की विश्व प्रसिद्ध धार्मिक नगरी ओरछा को आज पूरी दुनिया में 'भगवान राम राजा' की पावन नगरी के रूप में जाना जाता है, जहाँ श्रीराम को एक राजा के रूप में पूजा जाता है। लेकिन बहुत कम लोग यह जानते हैं कि ओरछा नगरी को राम राजा की स्थापना से पहले भगवान कृष्ण की नगरी के रूप में पहचाना जाता था। इतिहास के पन्नों के अनुसार, यहाँ भगवान राम के विग्रह की स्थापना से पहले भगवान श्री कृष्ण के दिव्य विग्रह (प्रतिमा) को वृंदावन से लाकर ओरछा में स्थापित किया गया था, जो वर्तमान में पन्ना के प्रसिद्ध मंदिर में विराजमान है। इसके बावजूद, ओरछा में आज भी रामनवमी की तरह भगवान श्री कृष्ण जन्मोत्सव यानी कृष्ण जन्माष्टमी अत्यंत धूमधाम और भव्यता के साथ मनाई जाती है।
📜 राजा मधुकर शाह की कृष्ण भक्ति और राजगुरु हरिराम व्यास से जुड़ी कथा: ऐसे ओरछा आए थे जुगलकिशोर जी
ओरछा के मंदिर के पुजारी हरिश्चंद्र तिवारी बताते हैं कि ओरछा की संस्कृति और इतिहास का भगवान राम के साथ-साथ भगवान कृष्ण से भी अटूट संबंध है। ओरछा के बुंदेली शासक मधुकर शाह जूदेव भगवान बांके बिहारी के अनन्य और परम भक्त थे, और उनके राजगुरु हरिराम व्यास भी बड़े कृष्ण भक्त थे। एक बार राजगुरु हरिराम व्यास ओरछा छोड़कर वृंदावन चले गए थे। मान्यता है कि विक्रम संवत 1620 में वृंदावन के किशोरवन में एक प्राचीन कुएं से उन्हें जुगलकिशोर जी का दिव्य विग्रह प्राप्त हुआ था, जिसे उन्होंने वहीं प्रतिष्ठित किया था। राजगुरु के वृंदावन जाने के कुछ समय बाद राजा मधुकर शाह भी वहाँ पहुँचे और उन्होंने वापस ओरछा न लौटने की इच्छा जताई। राजा की अगाध कृष्ण भक्ति से प्रसन्न होकर राजगुरु ने कुएं से मिला वह दिव्य विग्रह उन्हें सौंपते हुए ओरछा ले जाने का आदेश दिया, जिसे राजा मधुकर शाह ने ओरछा में स्थापित किया था।
👑 पन्ना में कैसे पहुँची भगवान कृष्ण की यह प्रतिमा? रानी कुंवरी गणेश और अयोध्या के सरयू तट की अद्भुत कथा
पुजारी हरिश्चंद्र तिवारी के अनुसार, ओरछा में स्थापित की गई भगवान कृष्ण की वह दिव्य प्रतिमा आज मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में 'पन्ना के जुगलकिशोर महाराज' के रूप में विराजमान है। उस दौर में राजा मधुकर शाह की पत्नी कुंवरी गणेश भगवान राम की अनन्य भक्त थीं। जब ओरछा में भगवान कृष्ण की प्रतिमा स्थापित हुई, तो राजा ने रानी से कहा कि हमारे कृष्ण तो आ गए, आपके भगवान राम कहाँ हैं? इस बात पर रानी कुंवरी गणेश ने रुष्ट होकर अयोध्या जाने का निर्णय लिया और प्रण किया कि एक महीने में यदि उन्हें उनके राम नहीं मिले, तो वे सरयू नदी में अपने प्राण त्याग देंगी। 21 दिनों की कठोर तपस्या के बाद जब उनके आराध्य प्रकट नहीं हुए, तो रानी ने सरयू नदी में छलांग लगा दी। कहा जाता है कि रानी की सच्ची भक्ति को देखकर भगवान राम नदी के जल में ही उनकी गोद में आ गए। इसके बाद भगवान कृष्ण की इस प्रतिमा को पन्ना ले जाया गया, जिसके संबंध में आज भी कहावत प्रचलित है— "राम राजा ओरछा विराजे, पन्ना जुगलकिशोर जू"। आगे चलकर 18वीं सदी में पन्ना नरेश हिंदूपत सिंह ने पन्ना में भव्य जुगलकिशोर मंदिर का निर्माण कराया, जबकि ओरछा के मुख्य मंदिर में आज भी भगवान राम के विग्रह के ठीक सामने भगवान कृष्ण विराजमान हैं।
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