'गुरु कुम्हार शिष कुंभ है' - जानिए संत कबीर के इन प्रेरणादायक दोहों के गहरे अर्थ

शिक्षक दिवस के अवसर पर पढ़ें संत कबीरदास के प्रसिद्ध दोहे जो गुरु-शिष्य के पवित्र संबंध और गुरु की महानता का बखान करते हैं।

Sep 05, 2026 - 10:05
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'गुरु कुम्हार शिष कुंभ है' - जानिए संत कबीर के इन प्रेरणादायक दोहों के गहरे अर्थ

भारतीय संस्कृति में गुरु को केवल किताबों का ज्ञान देने वाला शिक्षक नहीं, बल्कि सही-गलत का फर्क समझाने वाला और जीवन का सही मार्ग दिखाने वाला पथ-प्रदर्शक माना गया है। संत कबीरदास जी ने अपने दोहों में गुरु की महिमा, उनकी सीख और शिष्य के प्रति उनके योगदान को बेहद सरल, सहज और मर्मस्पर्शी शब्दों में पिरोया है। शिक्षक दिवस के इस पावन अवसर पर आइए पढ़ते हैं संत कबीर के वे प्रसिद्ध दोहे जो गुरु-शिष्य के पवित्र संबंध और गुरु की महानता का अनुपम बखान करते हैं—

🏺 'गुरु कुम्हार शिष कुंभ है'—संत कबीर के वे दोहे जो जीवन के हर मोड़ पर देते हैं सही मार्गदर्शन
  • यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान। शीश दिए जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान॥ (अर्थ: मनुष्य का यह शरीर सांसारिक बुराइयों रूपी विष की बेल है, जबकि गुरु साक्षात अमृत की खान हैं। यदि अहंकार त्याग कर भी सच्चे गुरु की प्राप्ति हो, तो इसे बहुत सस्ता सौदा समझना चाहिए।)

  • कबीरा ते नर अंध हैं, गुरु को कहते और। हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहिं ठौर॥ (अर्थ: जो लोग गुरु को साधारण मनुष्य समझते हैं, वे अज्ञानी हैं। ईश्वर के रूठने पर गुरु की शरण मिल सकती है, लेकिन गुरु के रूठने पर संसार में कहीं ठिकाना नहीं मिलता।)

  • सब धरती कागद करूं, लेखनी सब बनराय। सात समुद्र की मसि करूं, गुरु गुण लिखा न जाय॥ (अर्थ: यदि पूरी पृथ्वी को कागज, सभी वृक्षों को कलम और सातों समुद्रों के जल को स्याही बना दिया जाए, तब भी गुरु के महान गुणों का वर्णन पूरा नहीं किया जा सकता।)

  • गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि गढ़ि काढ़ै खोट। अंतर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट॥ (अर्थ: जिस प्रकार कुम्हार घड़े को बाहर से चोट मारकर और अंदर से हाथ का सहारा देकर संवारता है, वैसे ही गुरु शिष्य की कमियों को दूर करने के लिए अनुशासन की कठोरता के साथ प्रेम भी देते हैं।)

✨ गुरु के बिना ज्ञान और मोक्ष संभव नहीं—कबीरदास की दृष्टि में गुरु का स्थान
  • गुरु बिन ज्ञान न ऊपजै, गुरु बिन मिलै न मोष। गुरु बिन लखै न सत्य को, गुरु बिन मिटै न दोष॥ (अर्थ: गुरु के बिना न तो विवेक या सच्चा ज्ञान उत्पन्न हो सकता है और न ही मोक्ष की प्राप्ति संभव है। बिना गुरु के मार्गदर्शन के व्यक्ति न तो सत्य को पहचान सकता है और न ही अपने भीतर के दोषों और बुराइयों को मिटा सकता है।) संत कबीर के ये दोहे आज के आधुनिक युग में भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने उस काल में थे। एक सच्चा गुरु ही हमारे जीवन से अज्ञान के अंधकार को दूर करके हमें सही मार्ग पर अग्रसर करता है।

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