पति को 'शराबी' बताकर क्लेम खारिज करना बीमा कंपनी को पड़ा महंगा; आयोग ने सुनाया सख्त फैसला

भोपाल जिला उपभोक्ता आयोग ने बीमा कंपनी पर लगाया जुर्माना। पति को 'शराबी' बताकर क्लेम खारिज करना पड़ा भारी, अब पीड़ित पत्नी को ब्याज सहित मिलेगी क्लेम राशि।

Jul 01, 2026 - 19:00
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पति को 'शराबी' बताकर क्लेम खारिज करना बीमा कंपनी को पड़ा महंगा; आयोग ने सुनाया सख्त फैसला

भोपाल। राजधानी में एक निजी इंश्योरेंस कंपनी की मनमानी को जिला उपभोक्ता आयोग ने सख्ती से रोक दिया है। सड़क हादसे में पति को खो चुकी एक विधवा को परेशान करने और झूठे तर्कों के आधार पर क्लेम खारिज करने वाली कंपनी को आयोग ने न केवल क्लेम राशि देने का आदेश दिया, बल्कि मानसिक प्रताड़ना के लिए उस पर हर्जाना भी लगाया है। यह मामला इंश्योरेंस कंपनियों की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े करता है।

📋 क्या था पूरा मामला?

पिपलानी निवासी विनय कुमार की वर्ष 2021 में एक सड़क हादसे में मृत्यु हो गई थी। उन्होंने अपने परिवार की सुरक्षा के लिए 2019 में मेडिक्लेम पॉलिसी ली थी। पति की मृत्यु के बाद जब उनकी पत्नी ने दो लाख रुपये के इंश्योरेंस क्लेम के लिए आवेदन किया, तो बीमा कंपनी ने संवेदनशीलता के बजाय मृतक के चरित्र पर सवाल खड़े करते हुए उन्हें 'शराबी' घोषित कर दिया। कंपनी ने दावा किया कि शराब के सेवन के कारण ही दुर्घटना हुई, जो पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन है और इसी आधार पर क्लेम को खारिज कर दिया।

🔍 पोस्टमार्टम रिपोर्ट से खुला कंपनी का झूठ

मामला जब जिला उपभोक्ता आयोग में पहुंचा, तो न्यायधीशों ने साक्ष्यों की बारीकी से जांच की। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में यह स्पष्ट हो गया कि मृत्यु का कारण दुर्घटना में लगी गंभीर चोटें थीं, न कि शराब का सेवन। मेडिकल रिपोर्ट ने बीमा कंपनी द्वारा गढ़े गए झूठ का पर्दाफाश कर दिया, जिसके बाद आयोग ने कंपनी को सेवा में गंभीर कमी (Deficiency in Service) का दोषी पाया।

💰 कंपनी को देना होगा ब्याज और हर्जाना

उपभोक्ता आयोग ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा है कि बीमा कंपनी को पीड़ित महिला को 2 लाख रुपये की क्लेम राशि 7 प्रतिशत सालाना ब्याज दर के साथ देनी होगी। इसके अलावा, एक बेसहारा महिला को कानूनी लड़ाई में उलझाने और मानसिक रूप से प्रताड़ित करने के हर्जाने के रूप में कंपनी पर 15 हजार रुपये का अतिरिक्त जुर्माना भी लगाया गया है। यह फैसला उन तमाम लोगों के लिए एक नजीर है जो बीमा कंपनियों के शोषण के शिकार होते हैं।

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