1958 का राजस्व रिकॉर्ड बना ढाल! मंत्री प्रतिमा बागरी का SC सर्टिफिकेट वैध, शिकायतकर्ता की आपत्ति खारिज

MP की राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी को फर्जी जाति प्रमाण पत्र मामले में छानबीन समिति से क्लीन चिट मिली है। समिति ने उनके SC सर्टिफिकेट को पूरी तरह वैध माना है।

Jul 17, 2026 - 11:20
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1958 का राजस्व रिकॉर्ड बना ढाल! मंत्री प्रतिमा बागरी का SC सर्टिफिकेट वैध, शिकायतकर्ता की आपत्ति खारिज

भोपाल। फर्जी जाति प्रमाण पत्र के हाई-प्रोफाइल मामले में मध्य प्रदेश की नगरीय विकास एवं आवास राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी को एक बड़ी राहत मिली है. अनुसूचित जाति मामलों की राज्य स्तरीय छानबीन समिति ने इस संवेदनशील मामले की विस्तृत जांच के बाद प्रतिमा बागरी को पूरी तरह से क्लीन चिट दे दी है. समिति ने अपनी आधिकारिक रिपोर्ट में मंत्री प्रतिमा बागरी के अनुसूचित जाति (SC) प्रमाण पत्र को पूर्णतः वैध और नियमानुसार सही माना है. जांच समिति ने शिकायतकर्ता प्रदीप अहिरवार द्वारा पेश की गई तमाम आपत्तियों को तथ्यों से परे और निराधार मानते हुए अमान्य कर दिया है और इस पूरे प्रकरण को हमेशा के लिए खत्म कर दिया है. दूसरी ओर, शिकायतकर्ता प्रदीप अहिरवार का कहना है कि वे इस फैसले से संतुष्ट नहीं हैं और इस मामले में आगे तक अपनी कानूनी लड़ाई जारी रखेंगे.

⚖️ 2. 2007 की अधिसूचना के तहत बागरी जाति वैध: राजपूत या ठाकुर होने के नहीं मिले कोई प्रमाण

जांच रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि इस मामले में अनुविभागीय अधिकारी (SDO) नागौद द्वारा पूर्व में जारी प्रतिमा बागरी के अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र को पूरी तरह वैध पाया गया है.

भारत सरकार की अधिसूचना का संदर्भ: भारत सरकार द्वारा 30 अगस्त 2007 को एक संशोधित अधिसूचना जारी की गई थी. इस अधिसूचना के अनुसार, बागरी/बागड़ी (बागरी, बागड़ी में राजपूत और ठाकुर उपजातियों को छोड़कर) को पूरे मध्य प्रदेश राज्य के लिए अनुसूचित जाति का दर्जा प्राप्त है. जांच रिपोर्ट में साफ बताया गया कि सतना जिले की बागरी जाति के बागरी/बागड़ी में राजपूत या ठाकुर उपजाति के होने के कोई भी ऐतिहासिक या व्यावहारिक प्रमाण नहीं मिले हैं.

❌ 3. प्रदीप अहिरवार की आपत्तियां छानबीन समिति ने कीं खारिज: 2004 और 2018 के दस्तावेज पाए गए सही

छानबीन समिति ने अपनी जांच रिपोर्ट में यह माना कि शिकायतकर्ता प्रदीप अहिरवार द्वारा सुनवाई के दौरान ऐसा कोई भी ठोस तथ्य या दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया, जिससे यह साबित हो सके कि प्रतिमा बागरी अनुसूचित जाति की बागरी न होकर राजपूत और ठाकुर श्रेणी वाली बागरी हैं. जांच समिति ने गहन तफ्तीश के दौरान प्रस्तुत किए गए सभी वैध दस्तावेजों के आधार पर वर्ष 2004 और वर्ष 2018 में जारी किए गए प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण पत्रों को पूरी तरह सही माना है और शिकायतकर्ता की आपत्ति को सिरे से खारिज कर दिया है.

🗺️ 4. जाति प्रमाण पत्र पर नहीं लागू होती किसी जिले की सीमा: 1958 का पुराना राजस्व रिकॉर्ड बना मुख्य आधार
  • भौगोलिक सीमा का नियम: समिति ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया है कि किसी भी नागरिक के वैध जाति प्रमाण पत्र पर किसी विशेष जिले की सीमा या कोई क्षेत्रीय प्रतिबंध लागू नहीं होता है.

  • पारिवारिक पृष्ठभूमि: रिकॉर्ड्स के अनुसार, प्रतिमा बागरी का परिवार वर्ष 1950 से भी पहले से सतना जिले की नागौद तहसील के ग्राम वसुधा में रह रहा था. इसके बाद उनका परिवार ग्राम हरदुआ मझोल में जाकर बस गया था.

  • पुश्तैनी रिकॉर्ड की पुष्टि: सरकारी राजस्व रिकॉर्ड की जांच करने पर यह पाया गया कि प्रतिमा बागरी के परदादा रामगोपाल बागरी का नाम वर्ष 1958-59 के शासकीय रिकॉर्ड में स्पष्ट रूप से 'बागरी' जाति के रूप में दर्ज है.

उल्लेखनीय है कि छानबीन समिति ने 6 जुलाई को इस जाति प्रमाण पत्र के मामले में अंतिम सुनवाई की थी, जिसमें शिकायतकर्ता प्रदीप अहिरवार और राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी दोनों ने समिति के समक्ष व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर अपना-अपना पक्ष रखा था, जिसके बाद यह अंतिम निर्णय आया है.

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