सरकारी स्कूलों से क्यों मोहभंग कर रहे अभिभावक? रिटायर्ड शिक्षक ने खोली प्रशासनिक व्यवस्था की पोल
छिंदवाड़ा के 82 से अधिक सरकारी स्कूलों में छात्र संख्या 10 से भी कम रह गई है। पहली कक्षा में 8 हजार एडमिशन घटने के कारणों पर देखिए यह विशेष ग्राउंड रिपोर्ट।
छिंदवाड़ा। मध्य प्रदेश में एक ओर जहाँ सरकारी स्कूलों की तारीफ में सरकार लगातार कसीदे पढ़ती रहती है, वहीं दूसरी ओर जमीनी हकीकत इन बड़े-बड़े दावों को पूरी तरह फीका कर रही है. प्रदेश के सरकारी स्कूलों में भौतिक सुविधाएं भी भरपूर हैं और पढ़ाने वाले उच्च योग्यताधारी शिक्षकों की संख्या भी पर्याप्त है, लेकिन इन सब के बावजूद कक्षाओं से बच्चे पूरी तरह नदारद हैं. ग्रामीण अंचलों में हालात इतने चिंताजनक हो गए हैं कि बच्चे इन स्कूलों में एडमिशन (दाखिला) ही नहीं लेना चाह रहे हैं. इसका सीधा नतीजा यह हो रहा है कि सरकारी स्कूलों में दर्ज होने वाले छात्रों की संख्या साल-दर-साल घटती जा रही है, जबकि इसके विपरीत निजी (प्राइवेट) स्कूलों में बच्चों की भारी भरमार देखने को मिल रही है.
📊 2. जिले के 82 स्कूलों में छात्र संख्या 10 से भी कम: शिक्षकों की फौज तैनात, पर कक्षाएं खाली
जिले के सरकारी स्कूलों में छात्र संख्या का ग्राफ लगातार नीचे गिर रहा है. हालात इस कदर बदतर हो चुके हैं कि जिले भर के 82 से ज्यादा स्कूल ऐसे हैं, जहाँ कुल दर्ज छात्र संख्या शून्य से लेकर मात्र दस तक ही सिमट कर रह गई है. यानी इन स्कूलों में उंगलियों पर गिनने लायक विद्यार्थी ही पढ़ रहे हैं. हालांकि, इन गिने-चुने बच्चों को पढ़ाने के लिए सरकार द्वारा यहाँ शिक्षकों की अच्छी-खासी संख्या पदस्थ की गई है. जिला शिक्षा केंद्र की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, जिले के 82 शासकीय प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल इस संकट से जूझ रहे हैं. इनमें भी मोहखेड़, बिछुआ, जुन्नारदेव और हर्रई विकासखंडों के स्कूलों में सबसे कम विद्यार्थी दर्ज हैं. पिछले कुछ वर्षों में लगातार घट रही इस छात्र संख्या के कारण विभाग अब इन स्कूलों को बंद कर पास के बड़े स्कूलों में मर्ज (विलय) करने की कार्रवाई कर रहा है.
🚶♂️ 3. 'स्कूल चलें हम' जैसे बड़े अभियान भी बेअसर: घर-घर जाने के बाद भी निजी स्कूलों की ओर झुकाव
एक तरफ जहाँ जिले के सरकारी स्कूलों में दाखिला लेने वाले विद्यार्थियों का आंकड़ा तेजी से कम हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ सरकार द्वारा 'स्कूल चलें हम' अभियान और 'शाला त्यागी (ड्रॉपआउट) बच्चों की तलाश' जैसे कई बड़े व खर्चीले आयोजन किए जा रहे हैं. इसके बावजूद जमीनी स्तर पर विद्यार्थियों की संख्या बढ़ाने में कोई सफलता नहीं मिल रही है.
विजयवाड़ा स्कूल के शिक्षक सुशील तिवारी ने बताया: "हम सरकार की सभी गाइडलाइंस के अनुसार लगातार ब्लॉक के हर घर में दस्तक देते हैं. पालकों को सरकारी स्कूलों में मिलने वाली सुविधाओं के प्रति जागरूक कर बच्चों का दाखिला सरकारी स्कूल में कराने के लिए प्रेरित करते हैं. लेकिन हमारे तमाम प्रयासों के बाद भी अधिकतर ग्रामीण और स्थानीय लोग अपने बच्चों का दाखिला महंगे निजी स्कूलों में ही करवा रहे हैं."
📉 4. पहली कक्षा में रिकॉर्ड 8 हजार एडमिशन घटे: 10 वर्षों से लगातार गिर रहा है नामांकन का ग्राफ
विभागीय आंकड़ों की समीक्षा की जाए तो पिछले कुछ सालों में प्राथमिक और माध्यमिक दोनों ही स्तर की कक्षाओं में दर्ज छात्र संख्या में भारी गिरावट आई है. इसका सबसे गंभीर और सीधा असर कक्षा पहली (प्रथम श्रेणी) के नामांकन पर पड़ा है. जिले में पिछले साल की तुलना में इस वर्ष कक्षा पहली में तकरीबन आठ हजार से ज्यादा एडमिशन कम हुए हैं. पिछले दस सालों का ट्रेंड देखें तो कक्षा पहली से आठवीं तक की सभी कक्षाओं में बच्चों का कुल आंकड़ा लगातार कम हुआ है. यही मुख्य वजह है कि जिले के दर्जनों प्राथमिक स्कूलों का अस्तित्व समाप्त हो गया है और उन्हें नजदीकी बड़े परिसरों में मर्ज कर दिया गया है.
📝 5. गैर-शैक्षणिक कार्यों का बोझ और घटती गुणवत्ता: रिटायर्ड शिक्षक अनिल सिंह ने बताई असली वजह
सरकारी व्यवस्था में आई इस गिरावट और पालकों के मोहभंग को लेकर शिक्षा जगत से जुड़े लोग भी चिंतित हैं.
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सुविधाएं बनाम पढ़ाई: रिटायर्ड शिक्षक अनिल सिंह का कहना है कि सरकारी स्कूलों में बच्चों के लिए यूनिफॉर्म, मुफ्त पुस्तकें और मध्याह्न भोजन (मिड-डे मील) जैसी तमाम व्यवस्थाएं सरकार द्वारा बेहद शानदार तरीके से की जा रही हैं. यहाँ पदस्थ शिक्षक भी निजी स्कूलों की तुलना में अधिक योग्य और प्रशिक्षित होते हैं.
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शिक्षकों पर गैर-शैक्षणिक कार्यों का दबाव: सबसे बड़ी खामी यह है कि सरकार और प्रशासनिक तंत्र इन शिक्षकों को साल भर पढ़ाई कराने के बजाय अन्य सरकारी सर्वे, चुनावी कार्यों और कागजी औपचारिकता में व्यस्त रखता है.
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अभिभावकों का निर्णय: इस गैर-शैक्षणिक दबाव के कारण शिक्षक चाहकर भी बच्चों की पढ़ाई पर पूरा ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते हैं. इसका सीधा असर स्कूल की शिक्षा गुणवत्ता और अंततः नए एडमिशन पर पड़ता है. यही कारण है कि अपने बच्चों के बेहतर भविष्य और गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई के लिए गरीब से गरीब पैरेंट्स (अभिभावक) भी तंगी के बावजूद निजी स्कूलों का रुख कर रहे हैं.
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