शहडोल में हथकरघा और हस्तशिल्प से बदली आदिवासियों की तकदीर, हुनरमंद कलाकार प्रतिदिन कमा रहे ₹600

शहडोल में हथकरघा और हस्तशिल्प निगम की ट्रेनिंग से लोगों के हुनर को पंख लगे हैं। ग्रामीण दरी, कालीन और लकड़ी की कलाकृतियां बनाकर प्रतिदिन ₹600 तक कमा रहे हैं।

Aug 06, 2026 - 17:51
0
शहडोल में हथकरघा और हस्तशिल्प से बदली आदिवासियों की तकदीर, हुनरमंद कलाकार प्रतिदिन कमा रहे ₹600

शहडोल: मध्य प्रदेश के शहडोल जिले में हथकरघा और हस्तशिल्प विकास निगम कार्यालय इन दिनों पूरी तरह गुलजार है। यहाँ के स्थानीय कलाकारों की अद्भुत कलाकृतियों को अब एक नई पहचान और पंख मिल गए हैं। कभी केवल खेती-किसानी करके अपने परिवार का भरण-पोषण करने वाले आम लोगों ने अब अपने हाथों के हुनर को अपनी आत्मनिर्भरता का मुख्य जरिया बना लिया है।

संत रविदास हस्तशिल्प एवं हथकरघा विकास निगम की मदद से इन कारीगरों ने दरी, कालीन, कारपेट, कागज पर पारंपरिक गोंडी पेंटिंग और लकड़ियों पर बेहद खूबसूरत व जीवंत कलाकृतियां तैयार करना शुरू कर दिया है, जिनकी बाजार में भारी डिमांड बनी हुई है। इस रचनात्मक कार्य से क्षेत्र के करीब 34 परिवारों के सदस्य सीधे तौर पर जुड़ चुके हैं।

🎯 विभाग द्वारा दी गई ट्रेनिंग का दिखने लगा सकारात्मक असर

संत रविदास हस्तशिल्प व हथकरघा विकास निगम की ओर से स्थानीय लोगों को 50-50 दिनों की दो अलग-अलग शिफ्टों में विशेष प्रशिक्षण (ट्रेनिंग) दिया गया था। इस ट्रेनिंग का नतीजा यह हुआ है कि अब युवा ही नहीं बल्कि बड़ी संख्या में महिलाएं भी अपनी पारंपरिक कला को अपनी नियमित आय का बड़ा जरिया बना रही हैं।

इसके लिए वे दिन-रात कढ़ी मेहनत कर रही हैं। महिला और पुरुष सभी मिलकर विभिन्न प्रकार की अनोखी और आकर्षक चीजें तैयार करने में पूरी तन्मयता से जुटे हुए हैं। वर्तमान में यहाँ अधिकतर महिलाएं दरी, कालीन और कारपेट तैयार कर रही हैं, जबकि कुछ हुनरमंद महिलाएं कागज पर सुंदर गोंडी पेंटिंग का उत्कृष्ट प्रदर्शन भी कर रही हैं।

💼 हुनरमंद लोगों को मिला रोजगार का बड़ा अवसर

छतवई हथकरघा एवं हस्तशिल्प केंद्र के प्रभारी प्रबंधक एस.एस. पांडे ने जानकारी देते हुए बताया कि, "प्रशिक्षण पूरा होने के बाद अच्छे और कुशल हुनरमंद लोगों को रोजगार उपलब्ध कराया गया है। वर्तमान में छतवई में कुल 34 परिवार के सदस्यों को रोजगार मिला हुआ है, जिनमें से 15 लोग ऐसे हैं जो विशेष रूप से लकड़ी पर अद्भुत कलाकारी कर रहे हैं। इसके अलावा 4 लोग गोंडी पेंटिंग के क्षेत्र में सक्रिय हैं, जबकि बाकी अन्य लोग कालीन और दरी में विभिन्न प्रकार की कलाकृतियां बनाने में जुटे हुए हैं।"

🪵 इस तरह लकड़ी में भी अपनी कला से फूंक रहे हैं जान

पचड़ी गांव के रहने वाले सुंदरलाल बैगा छतवई के हस्तशिल्प व हथकरघा केंद्र में काम करते हैं। उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि, "इस खास कलाकारी में मुख्य रूप से छेनी और हथौड़ी की मदद ली जाती है। इस काम को बेहद बारीकी और धैर्य के साथ करना पड़ता है। इसके लिए हम सभी ने पहले 50 दिनों का प्रशिक्षण लिया था, जिसके बाद हम जैसे करीब 34 हुनरमंद लोगों को नौकरी पर रखा गया है।"

वहीं, हस्तशिल्प केंद्र में कालीन तैयार कर रहीं संगीता नामदेव का कहना है कि, "हम सभी स्थानीय लोगों को यहाँ बहुत अच्छा रोजगार मिला हुआ है, जिससे मैं बेहद खुश हूँ। मैं यहाँ पूरी लगन के साथ दरी, कालीन और कारपेट बनाने का कार्य करती हूँ।"

💰 अपनी सुविधा के अनुसार काम कर प्रतिदिन ₹600 तक कमा रहे कलाकार

हथकरघा व हस्तशिल्प केंद्र के प्रभारी प्रबंधक एस.एस. पांडे ने आगे बताया कि, "यहाँ पर कुल 34 परिवारों को जॉब वर्क के माध्यम से लगातार रोजगार दिया जा रहा है। यहाँ काम करने वाले सभी लोग अपनी सुविधा के समय के अनुसार आते हैं और प्रतिदिन आसानी से ₹600 तक की कमाई कर लेते हैं। रोजगार देने की यह कल्याणकारी योजना आगे भी निरंतर चलती रहेगी।"

उन्होंने शासन की मंशा स्पष्ट करते हुए कहा कि यदि कोई कलाकार केंद्र तक आने में असमर्थ है, तो प्रशासन उनके घर पर ही मशीन और आवश्यक उपकरण उपलब्ध कराएगा। कारीगर घर पर ही अपने प्रोडक्ट्स तैयार करके केंद्र में जमा कर सकते हैं। वर्तमान समय में केंद्र में लकड़ी की करीब 120 कलाकृतियां, 70 के करीब गोंडी पेंटिंग और 220 के आसपास दरी और कालीन बनकर तैयार हो चुकी हैं।

🏛️ भोपाल के रविंद्र भवन में प्रदर्शित की जाएंगी स्थानीय कलाकृतियां

प्रभारी प्रबंधक एस.एस. पांडे ने यह भी बताया कि आगामी दिनों में भोपाल के प्रतिष्ठित रविंद्र भवन में एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया जाना है। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव होंगे, जहाँ इन सभी ग्रामीण कलाकारों की उत्कृष्ट कलाकृतियों का विशेष प्रदर्शन किया जाएगा।

इन सभी स्थानीय उत्पादों को अब ऑनलाइन माध्यमों से देश-विदेश के बाजारों में बेचने की पुख्ता तैयारियां चल रही हैं। उन्होंने बताया कि कलाकृतियों को ऑनलाइन बेचने की अधिकांश प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और बहुत जल्द ही इस संबंध में अच्छी खबर मिलने की पूरी उम्मीद है।

आदिवासी अंचल के इस हस्तशिल्प और हथकरघा को एक व्यापक और बड़ा बाजार दिलाने के लिए लगातार गंभीर प्रयास किए जा रहे हैं। इस पूरी व्यवस्था में और अधिक पारदर्शिता लाने के लिए सभी कलाकारों की एक विशेष समिति का गठन भी कर दिया गया है, जिसमें सभी 34 परिवार जुड़े हुए हैं। सामान बिकने के बाद उसका सारा पैसा सीधे समिति के खाते में आएगा और फिर संबंधित कलाकार के व्यक्तिगत खाते में राशि ट्रांसफर कर दी जाएगी।

What's Your Reaction?

Like Like 0
Dislike Dislike 0
Love Love 0
Funny Funny 0
Wow Wow 0
Sad Sad 0
Angry Angry 0

Comments (0)

User