चंबल अभयारण्य में अवैध खनन पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई; CEC ने सौंपी 15वीं रिपोर्ट

राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में अवैध रेत खनन पर सुप्रीम कोर्ट 22 जुलाई को सुनवाई करेगा। सीईसी ने रिपोर्ट नंबर 15 सौंपकर चंबल की राजस्व भूमि को 6 माह में संरक्षित वन घोषित करने और पुलों पर AI कैमरे लगाने की सिफारिश की है।

Jul 21, 2026 - 10:11
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चंबल अभयारण्य में अवैध खनन पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई; CEC ने सौंपी 15वीं रिपोर्ट

भोपाल । सुप्रीम कोर्ट राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य (National Chambal Sanctuary) में अवैध रेत खनन से संबंधित बेहद संवेदनशील और गंभीर मामले में बुधवार, 22 जुलाई को अहम सुनवाई करने जा रहा है. इससे पूर्व सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित सेंट्रल इम्पावर्ड कमेटी (CEC) ने शीर्ष अदालत में अपनी विस्तृत रिपोर्ट दाखिल की है. सीईसी ने अपनी सिफारिश में स्पष्ट किया है कि राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य का एक बड़ा हिस्सा वर्तमान में 'राजस्व भूमि' के रूप में दर्ज है. इसके कारण अवैध रूप से खोदी गई रेत, परिवहन वाहनों और उपकरणों को जब्त करने की वन विभाग की कानूनी शक्तियां काफी सीमित हो जाती हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने चंबल अभयारण्य के जलीय जीवों के प्राकृतिक आवास में हो रहे अवैध खनन का स्वतः संज्ञान लेते हुए मूल वाद दर्ज किया था. इस मामले में पूर्व में दो रिपोर्ट दाखिल कर चुकी सीईसी ने सोमवार को अपनी विस्तृत 'रिपोर्ट नंबर 15' अदालत में पेश की. सीईसी के सदस्य सचिव डॉ. सतीश सी. गारकोटी द्वारा दाखिल इस रिपोर्ट में चंबल नदी और उसके आसपास के पारिस्थिक तंत्र को बचाने तथा अवैध खनन रोकने के लिए कई ऐतिहासिक सिफारिशें की गई हैं.

सीईसी ने अनुशंसा की है कि चंबल क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले हर जिले में जिलाधिकारी (DM) की अध्यक्षता में एक समर्पित 'जिला प्रवर्तन और निगरानी समिति' का गठन किया जाए. यह समिति हर दो सप्ताह में क्षेत्र की निगरानी, कानून प्रवर्तन, दर्ज मुकदमों की प्रगति और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के क्रियान्वयन की गहन समीक्षा करेगी.

सीईसी ने अपनी प्रमुख सिफारिश में कहा है कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान—इन तीनों राज्यों में चंबल अभयारण्य के अंदर आने वाली समस्त राजस्व भूमियों को वन कानून के तहत आगामी छह माह के भीतर अनिवार्य रूप से 'संरक्षित वन' (Protected Forest) के रूप में अधिसूचित किया जाए. इस वैधानिक बदलाव से पूरे अभयारण्य क्षेत्र को एक समान कानूनी दायरा और मजबूत प्रवर्तन व्यवस्था मिल सकेगी, जिससे वन विभाग के अधिकारियों को अवैध खननकर्ताओं के खिलाफ कठोर कार्रवाई के अधिकार प्राप्त होंगे.

सीईसी की 15वीं रिपोर्ट में चंबल अभयारण्य को बचाने के लिए दिए गए मुख्य सुझावों का ब्योरा नीचे दी गई तालिका में देखा जा सकता है:

कार्यक्षेत्र / विषय सीईसी (CEC) द्वारा प्रस्तावित कदम व समय सीमा
भूमि अधिसूचना UP, MP और राजस्थान में स्थित राजस्व भूमि को 6 माह में 'संरक्षित वन' घोषित करना.
जिला स्तर पर निगरानी हर जिले में DM की अध्यक्षता में समिति का गठन, जो हर 2 सप्ताह में समीक्षा करेगी.
पुलों की सुरक्षा (NHAI) चंबल नदी के सभी पुलों पर AI कैमरे, ANPR सिस्टम और सुरक्षा जाली/बैरियर लगाना.
M-Sand विकल्प MP की तर्ज पर राजस्थान और UP में 3 माह के भीतर M-Sand निर्माण इकाइयां स्थापित करना.
सामुदायिक आजीविका डॉल्फ़िन व पक्षी व्याख्या कार्यक्रम, ईको-टूरिज्म और सामुदायिक गश्त का विस्तार.

अवैध खनन और परिवहन पर नकेल कसने के लिए भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) को विशेष जिम्मेदारी दी गई है. NHAI चंबल नदी पर बने सभी छोटे-बड़े पुलों पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित अत्याधुनिक निगरानी प्रणाली स्थापित करेगा. इसमें गाड़ियों की पहचान के लिए 'ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकग्निशन' (ANPR) तकनीक को अनिवार्य किया जाएगा. इसके साथ ही, पुलों की रेलिंग के साथ नीचे तक मजबूत सुरक्षा जाली या बैरियर लगाए जाएंगे, जिससे नदी में कचरा फेंकने और अनधिकृत रूप से नदी के तटों तक जाने के रास्तों को पूरी तरह से बंद किया जा सके.

रिपोर्ट में यह भी सुझाव दिया गया है कि तीनों राज्य विनियमित ईको-टूरिज्म, राष्ट्रीय जलीय जीव डॉल्फ़िन और प्रवासी पक्षी व्याख्या कार्यक्रम, सामुदायिक गश्त तथा स्थानीय निवासियों के लिए आजीविका के अन्य उपयुक्त मॉडल विकसित करेंगे, ताकि स्थानीय आबादी की अवैध रेत खनन पर निर्भरता को कम किया जा सके.

कानूनी रेत की उपलब्धता हेतु 3 माह का समय:

"सीईसी ने निर्देश दिए हैं कि अगले तीन माह के भीतर इसके लिए एक विस्तृत कार्ययोजना सौंपी जाएगी. मध्य प्रदेश मॉडल की तर्ज पर अब राजस्थान और उत्तर प्रदेश सरकारें भी अपने राज्यों में पर्याप्त मैन्युफैक्चर्ड सैंड (M-Sand) निर्माण इकाइयां और लाइसेंस प्राप्त रेत भंडारण डिपो स्थापित करेंगी. इससे बाजार में निर्माण कार्यों के लिए कानूनी रूप से प्राप्त रेत की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित होगी और अवैध रूप से नदी से निकाली जाने वाली रेत की मांग में बड़ी कमी आएगी."

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