स्वतंत्रता संग्राम की जीवंत धरोहर है मंडला जेल, बैरक नंबर 1 में दो पूर्व मुख्यमंत्रियों ने काटी थी सजा

मंडला जिला जेल स्वतंत्रता आंदोलन की एक महत्वपूर्ण धरोहर है। यहाँ मध्य प्रदेश के दो पूर्व मुख्यमंत्रियों सहित 63 स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने सजा काटी थी।

Aug 01, 2026 - 17:41
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स्वतंत्रता संग्राम की जीवंत धरोहर है मंडला जेल, बैरक नंबर 1 में दो पूर्व मुख्यमंत्रियों ने काटी थी सजा

मंडला: पवित्र नर्मदा नदी के तट पर स्थित मंडला की जिला जेल महज एक जेल नहीं, बल्कि हमारे देश के स्वतंत्रता आंदोलन की एक जीवंत और ऐतिहासिक धरोहर है। लगभग 4 एकड़ के बड़े क्षेत्रफल में फैली इस जेल में आज भले ही आम कैदी रहते हों, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब इन्हीं पुरानी बैरकों में भारत माता को स्वतंत्र कराने का सपना देखने वाले महान स्वतंत्रता सेनानियों को अंग्रेजों ने कैद करके रखा था।

इस ऐतिहासिक जेल की सबसे बड़ी और खास बात यह है कि इसी जेल की बैरक नंबर-1 में मध्य प्रदेश के दो पूर्व मुख्यमंत्री—पंडित रविशंकर शुक्ल और द्वारका प्रसाद मिश्र—ने भी अपनी कैद की सजा काटी थी। इतना ही नहीं, देश में आपातकाल (इमरजेंसी) के दौर में लोकतंत्र की रक्षा के लिए आवाज उठाने वाले मीसा बंदियों को भी इसी ऐतिहासिक जेल में रखा गया था।

🏛️ मंडला जेल की बैरक नंबर-1 में दो पूर्व मुख्यमंत्रियों ने काटी थी सजा

मंडला जेल की प्रत्येक बैरक देश के स्वतंत्रता संघर्ष की एक अनकही कहानी बयां करती है। जब कोई इतिहास प्रेमी इन पुरानी बैरकों के इतिहास को खंगालता है, तो उसे गहराई से यह अहसास होता है कि कभी इसी जगह बैठकर देश की आजादी के बड़े सपने बुने गए थे, और यहीं से अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ गुप्त रणनीतियां बनाई जाती थीं।

इसी जेल की दीवारों ने अंग्रेजों के खिलाफ आवाज बुलंद करने का वह हौसला देखा था, जिसने भारत की आजादी की नींव को मजबूत किया था। इस जेल में ब्रिटिश शासन के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले कुल 63 स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को कैद रखा गया था। इनमें विशेष रूप से बैरक नंबर-1 वह स्थान है जहाँ मध्य प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल और चौथे मुख्यमंत्री द्वारका प्रसाद मिश्र ने अंग्रेजों के समय अपनी सजा पूरी की थी।

📜 जेल परिसर में आज भी मौजूद है 63 स्वतंत्रता सेनानियों की नाम पट्टिका

मंडला की यह जिला जेल आज भी उन अमर वीरों के बलिदान और संघर्ष की स्पष्ट गवाही देती है, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भाग लेकर इस जेल की यातनाएं सही थीं।

जेल अधीक्षक संजय सहलाम इस बारे में जानकारी देते हुए बताते हैं कि, ''जिला जेल की स्थापना वर्ष 1875 में की गई थी। यह मूल रूप से एक अर्ध-अंडाकार (Semi-elliptical) शेप में बनाई गई थी। साल 2014 में इसका पुनरुद्धार और उन्नयन (Upgradation) किया गया था, जिसके बाद यहाँ एल-शेप में 3 नई बैरकें बनाई गईं। इसके पश्चात, वर्ष 2025 में एक और नई बैरक का निर्माण किया गया है।''

आज भी इस जेल के मुख्य गेट पर एक भव्य पट्टिका लगी है, जिस पर उन सभी 63 स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के नाम गर्व के साथ अंकित हैं। जेल अधीक्षक के अनुसार, बैरक नंबर-1 में मध्य प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल ने 27 नवंबर 1944 से 13 जून 1945 तक इस जेल में सजा काटी थी। इसके अलावा, राज्य के चौथे मुख्यमंत्री द्वारका प्रसाद मिश्र ने भी 28 जून 1944 से 14 जुलाई 1945 तक इसी जेल की कोठरी में समय बिताया था।

📍 आजादी से पहले नागपुर हुआ करती थी मध्य प्रदेश की राजधानी

यह बैरक नंबर-1 आज भी उस पुराने दौर की एक मूक गवाह है, जब सत्ता या पद नहीं बल्कि देश की पूर्ण स्वतंत्रता ही हर भारतीय का सबसे बड़ा और इकलौता सपना हुआ करती थी।

जेल अधीक्षक संजय सहलाम ने बताया कि उस समय मंडला और डिंडोरी एक ही संयुक्त जिला हुआ करते थे, और इस पूरे अंचल के तमाम स्वतंत्रता सेनानियों को मंडला, सिवनी तथा जबलपुर की जेलों में कैद करके रखा जाता था। मंडला जिला जेल उस दौरान स्वतंत्रता आंदोलन का एक बहुत बड़ा केंद्र बिंदु हुआ करती थी। इसके अलावा, जब साल 1975 में देश में आपातकाल लागू किया गया, तब लोकतंत्र की आवाज को कुचलने के खिलाफ खड़े होने वाले मीसा बंदियों को भी इसी सुरक्षित जेल में नजरबंद रखा गया था।

🏹 स्वतंत्रता संग्राम में आदिवासी समाज की रही है अत्यंत अहम भूमिका

मंडला एक प्रमुख आदिवासी बहुल जिला है, और इस क्षेत्र के जनजातीय (आदिवासी) समाज ने देश की आजादी की लंबी लड़ाई में बेहद महत्वपूर्ण और साहसिक भूमिका निभाई है।

क्षेत्र के कई स्वतंत्रता सेनानियों के परिवार और परिजन आज भी गर्व से बताते हैं कि उनके पूर्वजों ने ब्रिटिश हुकूमत की क्रूर यातनाएं झेली थीं और मंडला जेल की काल कोठरियों में कई-कई महीनों तक कैद रहे थे। मंडला जिला जेल का यह गौरवशाली इतिहास आज भी हमें यह याद दिलाता है कि हमें मिलने वाली यह आजादी केवल एक तारीख भर नहीं है, बल्कि यह देश के हज़ारों वीर सपूतों के महान बलिदानों की एक अनमोल विरासत है।

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