प्रदेश के 1,895 स्कूल शिक्षक विहीन, 5,000 भवन जर्जर; हाई कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार को थमाया नोटिस
मध्य प्रदेश में शिक्षा व्यवस्था की पोल खुली। 1.15 लाख शिक्षक पद खाली और हजारों स्कूल बुनियादी सुविधाओं से वंचित। हाई कोर्ट ने शासन को नोटिस जारी कर मांगा जवाब।
इंदौर । मध्य प्रदेश की शैक्षणिक व्यवस्था की बदहाली को लेकर इंदौर हाई कोर्ट में दायर जनहित याचिका पर युगलपीठ ने केंद्र और राज्य शासन को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। न्यायमूर्ति सुबोध अभ्यंकर और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की पीठ ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए अगली सुनवाई 22 जुलाई नियत की है। यह याचिका सेंधवा निवासी बी.एल. जैन द्वारा अधिवक्ता अभिषेक तुगनावत के माध्यम से प्रस्तुत की गई है।
📉 चौंकाने वाले आंकड़े: शिक्षकों के 40% पद रिक्त
याचिका में कैग (CAG) की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया गया कि प्रदेश की शैक्षणिक स्थिति चिंताजनक है। आंकड़ों के अनुसार:
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प्रदेश में शिक्षकों के 2 लाख 89 हजार स्वीकृत पदों में से 1 लाख 15 हजार 678 पद रिक्त हैं।
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5,000 स्कूल भवन जर्जर और असुरक्षित हैं।
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3,400 स्कूलों में शौचालय और 10,000 स्कूलों में बिजली की सुविधा तक नहीं है।
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1,895 स्कूल ऐसे हैं जहाँ एक भी शिक्षक पदस्थ नहीं है।
⚠️ डिजिटल इंडिया के दौर में स्कूलों का हाल बेहाल
याचिकाकर्ता ने न्यायालय का ध्यान आकर्षित किया कि प्रदेश के 59,000 स्कूलों में कंप्यूटर की सुविधा नहीं है। साथ ही, पिछले दस वर्षों में जनसंख्या वृद्धि के बावजूद शासकीय स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या में 22 लाख 3 हजार की कमी दर्ज की गई है, जो व्यवस्था में गिरावट का संकेत है। याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि शासन बजट का 16 प्रतिशत हिस्सा मुफ्त की योजनाओं पर खर्च कर रहा है, जबकि शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मौलिक अधिकारों की उपेक्षा की जा रही है।
⚖️ निर्देशों का पालन न होने पर आक्रोश
अधिवक्ता ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2026 में स्पष्ट निर्देश दिए थे कि स्कूलों में बालिकाओं के लिए मुफ्त सेनेटरी पैड और छात्र-छात्राओं के लिए अलग-अलग शौचालय होने अनिवार्य हैं। इसके बावजूद इन निर्देशों का पालन धरातल पर नजर नहीं आ रहा है। याचिका में मांग की गई है कि शासन की इन खामियों पर कड़ी कार्रवाई की जाए ताकि प्रदेश के नौनिहालों को उनका शिक्षा का संवैधानिक अधिकार मिल सके।
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