नाम को लेकर छिड़ी बहस के बीच सामने आया सच; यजुर्वेद और कालिदास के ग्रंथों में क्या है उल्लेख?

उज्जैन की मोक्षदायिनी नदी का नाम अब सरकारी दस्तावेजों में 'शिप्रा' होगा। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने यजुर्वेद और कालिदास के ग्रंथों के आधार पर लिया फैसला।

Jul 05, 2026 - 18:57
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नाम को लेकर छिड़ी बहस के बीच सामने आया सच; यजुर्वेद और कालिदास के ग्रंथों में क्या है उल्लेख?

उज्जैन। सिंहस्थ 2028 की तैयारियों के बीच उज्जैन की जीवनदायिनी नदी अपने नाम को लेकर चर्चा में है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने एक उच्च स्तरीय बैठक के दौरान स्पष्ट किया है कि अब मध्य प्रदेश के सभी सरकारी दस्तावेजों में इस पवित्र नदी का नाम 'क्षिप्रा' के स्थान पर 'शिप्रा' लिखा जाएगा। मुख्यमंत्री ने यह निर्णय यजुर्वेद और महाकवि कालिदास के साहित्यिक ग्रंथों में दिए गए उल्लेखों के आधार पर लिया है।

📜 ग्रंथों और साहित्य में 'शिप्रा' का महत्व

साहित्यकारों और वैदिक विद्वानों के अनुसार, नदी के नाम को लेकर लंबे समय से तीन रूप प्रचलित रहे हैं— सिप्रा, शिप्रा और क्षिप्रा। साहित्यकार डॉ. भगवती लाल राजपुरोहित के अनुसार, महाकवि कालिदास ने अपने विश्व प्रसिद्ध ग्रंथ 'मेघदूत' और 'इंदुमती स्वयंवर' में 'शिप्रा' शब्द का ही प्रयोग किया है। वहीं, प्राचीन यजुर्वेद में भी 'शिप्रे: अवे: पत्र:' के माध्यम से इसी नाम का स्मरण मिलता है। मुख्यमंत्री ने एआई (Artificial Intelligence) के माध्यम से भी जब ऐतिहासिक संदर्भों की पुष्टि की, तो यह निष्कर्ष निकला कि 'शिप्रा' ही इसका मूल और शास्त्रीय नाम है।

🖋️ नाम का उद्गम और धार्मिक महत्व

इंदौर और धार जिले की काकड़ी टेकड़ी पहाड़ियों से उद्गमित होने वाली यह नदी लगभग 195 किलोमीटर का सफर तय कर चंबल में विलीन होती है। यह भारत की एकमात्र उत्तर-वाहिनी नदी मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अमृत बूंदों के गिरने से पवित्र हुई यह नदी मोक्षदायिनी है। हर 12 साल में आयोजित होने वाले सिंहस्थ महाकुंभ का केंद्र यही नदी है। अब मुख्यमंत्री के निर्णय के बाद, प्रशासनिक और आधिकारिक रिकॉर्ड में नाम को लेकर चल रहे लंबे संशय को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है।

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