"मंदिरों में मुस्लिमों को जगह क्यों नहीं?" - वक्फ बोर्ड में नियुक्ति पर भड़के मुफ्ती मोहम्मद अहमद
मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति पर बढ़ा विवाद। मुफ्ती मोहम्मद अहमद ने समानता के सिद्धांत का हवाला देते हुए सरकार के फैसले पर उठाए सवाल।
भोपाल। मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड में दो गैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। जमीयत उलेमा-ए-हिंद, मध्य प्रदेश के सदर मुफ्ती मोहम्मद अहमद ने इस फैसले का कड़ा विरोध किया है। उन्होंने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि जिस तरह अन्य धर्मों की धार्मिक संस्थाओं का संचालन उन्हीं के समुदाय के लोग करते हैं, वही व्यवस्था वक्फ बोर्ड में भी लागू होनी चाहिए।
🕌 "मंदिरों की तरह वक्फ बोर्ड का संचालन भी हो स्वतंत्र"
मुफ्ती मोहम्मद अहमद ने तर्क दिया कि यदि सरकार पारदर्शिता का दावा करती है, तो उसे यह नियम सभी धार्मिक संस्थाओं, विशेषकर मंदिरों और अन्य संस्थाओं पर भी लागू करना चाहिए। उन्होंने कहा, "सरकार पहले अपनी धार्मिक संस्थाओं के विवाद सुलझाए और हमें हमारे मजहबी मामलों को संभालने दे। कलेक्टर रैंक के सीईओ की नियुक्ति पर हमें कभी आपत्ति नहीं रही, लेकिन बोर्ड में गैर-मुस्लिम सदस्यों का समावेश धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के सिद्धांत के विपरीत है।"
⚠️ संपत्तियों की सुरक्षा को लेकर जताई आशंका
मुफ्ती अहमद ने इस फैसले के पीछे वक्फ की जमीनों और कब्रिस्तानों पर सरकार की नजर होने की आशंका जताई है। उन्होंने कहा कि वक्फ संपत्तियां मुस्लिम समाज द्वारा जनहित और धार्मिक उद्देश्यों के लिए समर्पित की गई हैं, और इस तरह के हस्तक्षेप से समाज में अविश्वास की भावना पैदा होगी। जमीयत का मानना है कि यह कदम समुदाय के संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ है।
⚖️ सुप्रीम कोर्ट में जारी रहेगी कानूनी लड़ाई
इस विवाद पर जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। मुफ्ती मोहम्मद अहमद के अनुसार, संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना सैयद अरशद मदनी के नेतृत्व में सुप्रीम कोर्ट में पहले ही याचिका दायर की जा चुकी है और इस फैसले के खिलाफ कानूनी लड़ाई मजबूती से जारी रहेगी। मुस्लिम समाज ने न्यायपालिका पर भरोसा जताते हुए संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष करने का संकल्प लिया है।
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