'30 साल पहले गांव छोड़ने वालों को बांटा मुआवजा' - केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट पर उमंग सिंघार के तीखे सवाल
मध्य प्रदेश की केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने लगाए बड़े घोटाले के आरोप। 500 से अधिक फर्जी मुआवजे और इलेक्टोरल बॉन्ड पर उठाए सवाल।
भोपाल। मध्य प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने देश की महत्वाकांक्षी केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना में बड़े पैमाने पर वित्तीय और प्रशासनिक अनियमितताओं के गंभीर आरोप लगाए हैं. उमंग सिंघार ने दावा किया है कि प्रशासन ने नियमों को ताक पर रखकर ऐसे लोगों को भी करोड़ों रुपये का मुआवजा बांट दिया, जो करीब 30 साल पहले ही गांव छोड़कर जा चुके हैं. शुरुआती जांच और दस्तावेजों के आधार पर इस तरह के करीब 500 से ज्यादा कथित फर्जी मुआवजा वितरण के मामले सामने आए हैं, जिसने प्रशासनिक महकमे में हड़कंप मचा दिया है.
🤝 2. प्रभावितों से मुलाकात के बाद खोला मोर्चा: नागार्जुन कंस्ट्रक्शन और इलेक्टोरल बॉन्ड पर उठाए गंभीर सवाल
नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने तीन दिन पहले छतरपुर जिले का दौरा कर केन-बेतवा परियोजना से प्रभावित स्थानीय ग्रामीणों और किसानों से मुलाकात की थी. इसके बाद शुक्रवार को राजधानी भोपाल में अपने शासकीय निवास पर पत्रकारों से रूबरू होते हुए उन्होंने इस परियोजना को लेकर कई तीखे सवाल खड़े किए. उन्होंने सीधा आरोप लगाया कि परियोजना का निर्माण कार्य कर रही नागार्जुन कंस्ट्रक्शन कंपनी ने इलेक्टोरल बॉन्ड (Electoral Bonds) के जरिए भारतीय जनता पार्टी (BJP) को ₹60 करोड़ का भारी-भरकम चंदा दिया है.
चंदे और ठेके का कनेक्शन:
उमंग सिंघार ने बताया कि यही कंपनी केन-बेतवा परियोजना के तहत बनने वाले 'दौधन बांध' के करीब ₹3400 करोड़ के बड़े निर्माण कार्य में शामिल है. उन्होंने सवाल उठाया कि मोटा चंदा मिलने की वजह से ही सरकार इस कंपनी के आर्थिक हितों में काम कर रही है और परियोजना को लेकर स्थानीय आदिवासियों और किसानों द्वारा की जा रही वैध शिकायतों को लगातार अनदेखा किया जा रहा है. नेता प्रतिपक्ष ने इस पूरे महाघोटाले की किसी स्वतंत्र केंद्रीय एजेंसी से निष्पक्ष जांच कराए जाने की मांग की है.
📋 3. ग्राम सभाओं और भूमि अभिलेखों में बड़ी धांधली: एक ही समय पर अलग-अलग पंचायतों में कागजी बैठकें
नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने सिलसिलेवार तरीके से इस ₹44 हजार करोड़ की महापरियोजना में पहले चरण से ही चल रही गड़बड़ियों का ब्योरा सामने रखा:
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ग्राम सभा की प्रक्रिया पर सवाल: पिछले करीब 4 सालों से विधि-सम्मत तरीके से अनिवार्य ग्राम सभा प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया. प्रभावित परिवारों को 'सोशल इम्पैक्ट असेसमेंट' (Social Impact Assessment) की कोई जानकारी नहीं दी गई और न ही उन्हें इस महत्वपूर्ण निर्णय प्रक्रिया में शामिल किया गया.
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संदेह के घेरे में तारीखें: अधिकांश ग्राम सभाओं की बैठकों का रिकॉर्ड 17-18 फरवरी 2022 को सुबह साढे़ 11 बजे का दर्ज है. अलग-अलग ग्राम पंचायतों में एक ही तारीख और एक ही समय पर बैठकें होना पूरी प्रक्रिया को गहरे संदेह के घेरे में खड़ा करता है.
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भूमि अभिलेखों में हेराफेरी: सुकवाहा गांव की एक स्थानीय आदिवासी महिला सुमता रानी की पैतृक जमीन को साजिश के तहत किसी अन्य व्यक्ति के नाम पर दर्ज कर दिया गया और ताज्जुब की बात यह है कि उसी अज्ञात व्यक्ति के नाम पर मुआवजा भी स्वीकृत कर दिया गया.
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पुनर्वास में देरी और जल्दबाजी: परियोजना को 3 अक्टूबर 2023 को 'स्टेज टू' वन स्वीकृति मिली थी. इसकी अनिवार्य शर्तों के अनुसार 3 अक्टूबर 2024 तक विस्थापितों का पुनर्वास और भूमि हस्तांतरण का काम पूरा होना था, लेकिन नियमों का उल्लंघन कर साल 2025 में सीधे निर्माण कार्य शुरू कर दिया गया.
👥 4. 30 साल पहले गांव छोड़ने वालों को मिला खैरात में मुआवजा: खरिहानी गांव में ₹8 करोड़ के फर्जीवाड़े का दावा
उमंग सिंघार ने मुआवजे के नाम पर अपात्र लोगों को फायदा पहुंचाने का एक और चौंकाने वाला उदाहरण पेश किया. उन्होंने बताया कि खरिहानी गांव के मकानों के विस्थापन के लिए करीब ₹11 करोड़ का मुआवजा स्वीकृत हुआ था, लेकिन उपलब्ध सरकारी दस्तावेजों के अनुसार, इसमें से करीब ₹8 करोड़ की राशि ऐसे बाहरी लोगों को दे दी गई जिनका वर्तमान में गांव से कोई वास्ता ही नहीं था.
| प्रभावित गांव | कुल स्वीकृत मुआवजा | कथित फर्जी वितरण | अनियमितता का प्रकार |
| खरिहानी (छतरपुर) | ₹11 करोड़ | करीब ₹8 करोड़ | 1980-90 में गांव छोड़ चुके अपात्र लोगों और बाहरी परिवारों को भुगतान |
उन्होंने स्पष्ट साक्ष्य देते हुए कहा कि जो लोग 1980 और 1990 के दशक में ही गांव छोड़ चुके थे, उन्हें भी मोटी रकम थमा दी गई. उदाहरण के तौर पर, गांव के मूल निवासी विश्वनाथ मिश्रा को मुआवजा दिया गया, जबकि वे साल 1992 में ही गांव छोड़ चुके थे. इसी तरह, खरिहानी गांव में एक ऐसे मुस्लिम परिवार को भी मुआवजा स्वीकृत कर दिया गया, जो परिवार कभी उस गांव की भौगोलिक सीमा में रहा ही नहीं था. नेता प्रतिपक्ष ने इस मामले में स्थानीय जिला कलेक्टर और प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि उच्च अधिकारियों द्वारा जानबूझकर इस पूरे मामले को दबाने का प्रयास किया जा रहा है.
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