बंजर जमीन बनी सोना! 'अल्ट्रा हाई डेंसिटी' और 'बैगिंग' तकनीक से उगाए विश्वप्रसिद्ध केसर आम
नरसिंहपुर के किसान विजय पाल सिंह ने इजराइल की अल्ट्रा हाई डेंसिटी तकनीक से रेतीली जमीन पर उगाया 54 हजार आम का बगीचा। जानें कैसे बैगिंग तकनीक से मिल रहा दोगुना दाम।
नरसिंहपुर। गाडरवारा तहसील के एक छोटे से गांव छेना कछार के एक प्रगतिशील किसान ने अपनी मेहनत और आधुनिक दृष्टिकोण से रेतीली जमीन पर अपने सपने को सच कर दिखाया है. नर्मदा नदी के किनारे की यह ऐसी जमीन थी, जिसे स्थानीय लोग रेतीली और बंजर कहकर पूरी तरह बेकार बताते थे. लेकिन इसी जमीन पर किसान ने बागवानी (Horiculture) का एक ऐसा आधुनिक मॉडल प्रस्तुत किया है, जो आज पूरे मध्य प्रदेश के किसानों के लिए एक बड़ा संदेश बन गया है. विदेशी तकनीक से विकसित किए गए आम के इस विशाल बगीचे से अब वे हर साल लाखों रुपये का मुनाफा कमा रहे हैं.
🇮🇱 2. इजराइल की 'अल्ट्रा हाई डेंसिटी' तकनीक का चमत्कार: 70 एकड़ में लहलहा रहे 54 हजार पौधे
मूल रूप से छिंदवाड़ा के निवासी और वर्तमान में नरसिंहपुर में कृषि कर रहे किसान विजय पाल सिंह पटेल ने पारंपरिक खेती के ढर्रे को छोड़कर आधुनिक बागवानी को प्राथमिकता दी. विजय पाल सिंह बताते हैं कि नदी किनारे की करीब 70 एकड़ रेतीली भूमि पर आम का यह बगीचा तैयार करना बेहद चुनौतीपूर्ण था. इसके लिए उन्होंने इजराइल की विश्वप्रसिद्ध 'अल्ट्रा हाई डेंसिटी' (Ultra High Density Technology) तकनीक को अपनाया.
तकनीक की खासियत:
सामान्य तौर पर पारंपरिक विधि से एक एकड़ में महज 65 से 100 आम के पौधे ही लगाए जा सकते हैं. वहीं, इजराइल की इस आधुनिक तकनीक के माध्यम से एक एकड़ क्षेत्र में 400 से लेकर 1400 तक पौधे आसानी से रोपे जा सकते हैं. वर्तमान में उनके इस बगीचे में विभिन्न उन्नत किस्मों के लगभग 54 हजार आम के पौधे लहलहा रहे हैं, जिनमें से 600 पौधे विशेष रूप से प्रसिद्ध 'केसर' किस्म के हैं. इसके अलावा बगीचे में कई अन्य देशी और विदेशी किस्में भी शामिल हैं.
🛍️ 3. फ्रूट बैगिंग तकनीक से मिलती है दोगुनी कीमत: गुजरात और राजस्थान के बाजारों में भारी मांग
विजय पाल सिंह के अनुसार, वे केवल उत्पादन बढ़ाने पर ही नहीं, बल्कि फलों की अंतरराष्ट्रीय स्तर की गुणवत्ता पर भी विशेष ध्यान दे रहे हैं. इसके लिए वे अपने बगीचे में 'फ्रूट बैगिंग' (Fruit Bagging Technology) तकनीक का इस्तेमाल करते हैं.
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कैसे काम करती है तकनीक: इस विधि में पेड़ पर लगे प्रत्येक फल को एक विशेष सुरक्षात्मक बैग (थैली) से ढका जाता है.
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गुणवत्ता में सुधार: बैगिंग के कारण आम का प्राकृतिक रंग, बाहरी चमक और मिठास बेहद शानदार होती है. साथ ही, फल तेज धूप, हानिकारक कीटों, ओलावृष्टि और पक्षियों के हमलों से पूरी तरह सुरक्षित रहते हैं.
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बाजार में बंपर दाम: इस तकनीक के इस्तेमाल से आमों को बाजार में साधारण आम के मुकाबले लगभग दोगुनी कीमत मिलती है. इस साल उनका केसर आम ₹172 प्रति किलो तक बिका, जबकि लंगड़ा आम का भाव ₹80 से ₹120 प्रति किलो तक रहा. यदि बैगिंग न की गई हो तो यही आम आधे दामों पर बिकते हैं. वर्तमान में इंदौर, जयपुर और गुजरात के बड़े बाजारों में इन आमों की भारी डिमांड है.
📈 4. कम जगह में 10 टन तक पैदावार की क्षमता: उद्यानिकी विभाग ने सराहा
नरसिंहपुर के चीचली ब्लॉक की उद्यानिकी अधिकारी सीमा केवट ने इस कृषि मॉडल की सराहना करते हुए इसके तकनीकी पहलुओं की जानकारी साझा की:
| तकनीकी मापदंड (Technical Parameter) | इजराइली तकनीक की विशेषता |
| पौधों के बीच की दूरी | प्रत्येक पौधा मात्र 4 फीट की दूरी पर लगाया जाता है |
| पौधे की अधिकतम ऊंचाई | बेहतर प्रबंधन के लिए पौधे को अधिकतम 10 फीट तक रखा जाता है |
| मुख्य किस्में (70 एकड़ में) | 45 एकड़ से अधिक क्षेत्र में केवल 'केसर' और 'जंबो केसर' का प्लांटेशन |
| आय का अनुमान | बगीचा पूरी तरह तैयार होने पर प्रति एकड़ करीब ₹2 लाख तक का शुद्ध मुनाफा |
किसान विजय पाल ने बताया कि शुरुआती 3 साल तक उत्पादन न मिलने और शुरुआती लागत अधिक होने के कारण आम किसान इस तकनीक से डरते हैं, लेकिन लंबी अवधि के लिए यह बेहद फायदेमंद है. पिछले वर्ष उन्हें प्रति एकड़ करीब 5 टन उत्पादन मिला था. इस वर्ष बेमौसम आंधी और ओलावृष्टि से फसल थोड़ी प्रभावित हुई है, अन्यथा 10 टन प्रति एकड़ तक उत्पादन की पूरी उम्मीद थी.
🎓 5. एमएससी जियोलॉजी पास हैं बगीचे के मालिक: पूसा और रहमानखेड़ा रिसर्च सेंटर से ली है ट्रेनिंग
छेना कछार गांव में कृषि क्रांति लाने वाले 57 वर्षीय किसान विजय पाल सिंह पटेल स्वयं उच्च शिक्षित हैं और उन्होंने जियोलॉजी (भू-विज्ञान) से एमएससी (M.Sc) की डिग्री ली है. कृषि के प्रति अपने जुनून के चलते उन्होंने भारत सरकार के कई शीर्ष कृषि अनुसंधान केंद्रों से बागवानी की व्यावहारिक ट्रेनिंग ली है:
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लखनऊ (CISH & SIAM): ICAR केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान, रहमानखेड़ा और राज्य कृषि प्रबंधन संस्थान से आम और अमरूद की एडवांस्ड बागवानी सीखी.
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नई दिल्ली (IARI & पूसा संस्थान): यहाँ से उन्होंने गेहूं, धान और विभिन्न सब्जियों की उन्नत एवं रोग-प्रतिरोधी किस्में विकसित करने का गहन प्रशिक्षण लिया.
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युवाओं को मार्गदर्शन: भारत सरकार के दिल्ली और लखनऊ रिसर्च सेंटर से प्रशिक्षित विजय पाल सिंह अब कृषि (Agriculture) की पढ़ाई कर रहे कॉलेज के छात्रों को भी इस इजराइली तकनीक का लाइव डेमोंस्ट्रेशन और ट्रेनिंग देते हैं.
विजय पाल सिंह ने देश के अन्य किसानों से अपील करते हुए कहा है कि यदि किसान शुरुआत में बड़े स्तर पर न सही, बल्कि प्रयोग के तौर पर कम से कम 100 पौधे भी इस 'अल्ट्रा हाई डेंसिटी' तकनीक से लगाएं, तो उनकी आर्थिक स्थिति और खेती की तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है. उनका यह सफल प्रयोग नरसिंहपुर जिले में एक मिसाल बन चुका है, जहां वे खुद लाखों कमा रहे हैं और साथ ही स्थानीय ग्रामीणों को रोजगार भी मुहैया करा रहे हैं.
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