'अपीलकर्ता को फंसाने के लिए की गई खराब जांच'; हाईकोर्ट ने बदला ट्रायल कोर्ट का फैसला, कलेक्टर को दिए निर्देश
जबलपुर हाईकोर्ट ने हत्या के मामले में युवक की उम्रकैद की सजा को रद्द करते हुए उसे दोषमुक्त कर दिया है। कोर्ट ने पुलिस जांच को दुर्भावनापूर्ण बताते हुए राज्य सरकार को युवक के पुनर्वास, ट्रेनिंग और मानदेय के निर्देश दिए।
जबलपुर। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने न्याय व्यवस्था और पुलिस कार्यप्रणाली को लेकर एक बेहद नजीर पेश करने वाला ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. हाईकोर्ट ने हत्या के एक मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई आजीवन कारावास की सजा को पूरी तरह निरस्त करते हुए अपीलकर्ता को बाइज्जत बरी कर दिया है. इसके साथ ही अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिए हैं कि वह जेल में समय गंवाने वाले इस युवक के पुनर्वास (Rehabilitation) की पूरी व्यवस्था करे. हाईकोर्ट के जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस एके सिंह की युगलपीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि अपीलकर्ता को दुर्भावनापूर्ण तरीके से फंसाने के लिए बेहद खराब और लापरवाह तरीके से जांच की गई थी, जिसके कारण निचली अदालत ने सबूतों का गलत मूल्यांकन कर उसे दोषी ठहराया था.
यह मामला कटनी जिले का है, जहाँ अर्जुन कोरी नाम के युवक की हत्या के आरोप में वहां के निवासी डब्बू उर्फ देव सोनखरे को आजीवन कारावास की सजा से दंडित किया गया था. निचली अदालत के इस फैसले को चुनौती देते हुए देव सोनखरे ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी. याचिका में तर्क दिया गया था कि ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्य के अभाव में इसी मामले के सह-आरोपी राहुल उर्फ सुन्नू बक्सरिया को तो पहले ही दोषमुक्त कर दिया था, लेकिन परिस्थितियों की कड़ियों में कोई भी ठोस सबूत न होने के बावजूद केवल अनुमानों के आधार पर मुख्य अपीलकर्ता को कठोर सजा से दंडित कर दिया, जो कि न्यायिक सिद्धांतों के खिलाफ था.
अभियोजन पक्ष (प्रॉसीक्यूशन) ने कोर्ट में यह कहानी पेश की थी कि आरोपी देव सोनखरे की बहन और मृतक अर्जुन कोरी के बीच प्रेम संबंध थे. अर्जुन का शव मिलने के बाद पुलिस ने आरोपी की बहन के टेलीफोन कॉल और मृतक के मोबाइल के कॉल लॉग्स के माध्यम से यह सिद्ध करने की कोशिश की थी कि इसी रंजिश के चलते अर्जुन की हत्या की गई.
परंतु, हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि पुलिस ने इस थ्योरी से संबंधित कोई भी स्वतंत्र या वैज्ञानिक सबूत पेश नहीं किया. पुलिस ने मामले में न तो मृतक का फोन जब्त किया और न ही आरोपी की बहन का मोबाइल और सिम कार्ड जब्त किया. कोर्ट ने साफ कहा कि केवल टेलीफोनिक रिकॉर्ड या कॉल लॉग्स का होना अवैध संबंधों के कारण हत्या किए जाने का कोई ठोस या कानूनी सबूत नहीं माना जा सकता.
जांच एजेंसी की लापरवाही यहीं खत्म नहीं हुई. पुलिस ने दावा किया था कि मृतक के कंकाल में जो तार बंधा मिला था, वही तार याचिकाकर्ता के घर से भी बरामद हुआ था. कोर्ट के सामने जब तथ्य आए तो पता चला कि कांस्टेबल राहुल कोरी ने उस तार को बिना सील किए ही जांच में शामिल कर लिया था और उसकी बरामदगी का कोई पंचनामा भी तैयार नहीं किया गया था.
इसके अलावा, जिन चश्मदीद गवाहों के आधार पर पुलिस केस तैयार कर रही थी, उन चश्मदीदों ने साफ तौर पर कहा कि उन्होंने अर्जुन कोरी को आखिरी बार देखने के दौरान आरोपी को कभी भी उसके साथ नहीं देखा था. गवाहों के मुकर जाने और जब्ती की प्रक्रिया में इतनी बड़ी अवैध चूक होने के कारण पुलिस का पूरा केस ताश के पत्तों की तरह ढह गया.
अदालत द्वारा रेखांकित की गई पुलिसिया जांच की कमियों और अंतिम फैसले को नीचे दी गई तालिका से आसानी से समझा जा सकता है:
| पुलिस जांच के मुख्य दावे | ग्राउंड जीरो पर सबूतों की असल सच्चाई | हाईकोर्ट का अंतिम निष्कर्ष व निर्देश |
| प्रेम संबंध के कारण हत्या | न फोन जब्त हुए, न ही कोई स्वतंत्र गवाह सामने आया | केवल कॉल रिकॉर्ड को हत्या का ठोस आधार नहीं माना जा सकता. |
| आरोपी के घर से तार की जब्ती | कांस्टेबल बिना सील किए तार ले गया; कोई पंचनामा नहीं बना | बरामदगी की पूरी प्रक्रिया अवैध और संदेहास्पद पाई गई. |
| चश्मदीदों की गवाही | किसी भी गवाह ने मृतक को आखिरी बार आरोपी के साथ नहीं देखा | परिस्थितियों की श्रृंखला (Chain of Circumstances) अधूरी थी. |
| पुलिस की मंशा | दुर्भावनापूर्ण और बेहद खराब तरीके से केस तैयार किया गया | फैसला: आजीवन कारावास निरस्त, बाइज्जत बरी और पुनर्वास का आदेश. |
तमाम तथ्यों और दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट की युगलपीठ ने पुलिस प्रशासन को कड़ी फटकार लगाई.
अदालत ने अपने ऐतिहासिक आदेश में राज्य सरकार को निर्देशित किया है कि वह अपने खर्च पर बरी हुए युवक के लिए कम से कम छह महीने के व्यावसायिक प्रशिक्षण (Vocational Training) कार्यक्रम की व्यवस्था करे, ताकि उसे उसकी रुचि के अनुसार आत्मनिर्भर बनाया जा सके. इस ट्रेनिंग अवधि के दौरान युवक को नियमानुसार मानदेय (Stipend) पाने का भी पूरा अधिकार होगा. हाईकोर्ट ने कटनी जिला कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक (SP) को सीधे निर्देश दिए हैं कि वे केंद्र व राज्य सरकार की विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के तहत युवक को सभी प्रकार की वित्तीय व सामाजिक सहायता प्रदान करें. साथ ही, प्रशासन को अगले दो साल तक हर तिमाही (Every Quarter) में युवक के पुनर्वास की प्रगति रिपोर्ट हाईकोर्ट में पेश करनी होगी.
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