Ujjain Shipra Model: शिप्रा आरती बनी पर्यावरण संरक्षण का जरिया, लाखों लोगों ने लिया नदियों को स्वच्छ रखने का संकल्प

उज्जैन की शिप्रा आरती अब केवल धार्मिक नहीं बल्कि पर्यावरण संरक्षण का अभियान है। 2.5 लाख से अधिक लोग नदी को स्वच्छ रखने का संकल्प ले चुके हैं।

Jun 18, 2026 - 14:45
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Ujjain Shipra Model: शिप्रा आरती बनी पर्यावरण संरक्षण का जरिया, लाखों लोगों ने लिया नदियों को स्वच्छ रखने का संकल्प

उज्जैन। नदियों को साफ रखने के लिए करोड़ों रुपये के बजट के बावजूद अक्सर परिणाम उत्साहजनक नहीं मिलते। लेकिन उज्जैन में शिप्रा नदी के तट पर चल रही एक मुहिम ने नई राह दिखाई है। यहाँ संध्या आरती अब केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का बड़ा अभियान बन चुकी है। इस मुहिम के तहत श्रद्धालुओं को नदी-तालाबों को प्रदूषण मुक्त रखने का संकल्प दिलाया जा रहा है, जिसका असर अब धरातल पर दिखने लगा है।

🌊 शिप्रा मॉडल: पूरे देश के लिए एक प्रेरणा

शिप्रा नदी के श्रीराम घाट से शुरू हुई यह पहल अब एक जन-आंदोलन का रूप ले रही है। पंडा समिति के अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी बताते हैं कि पिछले 50 दिनों में ढाई लाख से अधिक लोग इस संकल्प से जुड़ चुके हैं। श्रद्धालुओं को प्रेरित किया जा रहा है कि वे पूजा के बाद बची सामग्री—जैसे फूल, पत्तियां और अन्य जैविक कचरे को नदी में प्रवाहित न करें। इसके बजाय, उन्हें घर के बगीचों या गमलों में खाद के रूप में उपयोग करने का सुझाव दिया जाता है।

🙏 श्रद्धालुओं की जुबानी: 'नदी हमारी मां है, उसमें कचरा कैसा?'

देशभर से उज्जैन आने वाले श्रद्धालुओं ने इस प्रयास की सराहना की है। हरियाणा से आईं जिगीशा और उत्तर प्रदेश से आए दिलीप सिंह ने कहा कि आस्था को पर्यावरण से जोड़ना एक सराहनीय कदम है। जयपुर के श्रद्धालु हिमांशु दवे का मानना है कि "नदी को हम मां का दर्जा देते हैं, तो फिर उनके सिर पर कचरा क्यों डालें?" लोग अब संकल्प ले रहे हैं कि वे स्वयं भी कचरा नहीं फैलाएंगे और अपने आस-पड़ोस के लोगों को भी इसके प्रति जागरूक करेंगे।

🧪 वैज्ञानिक नजरिया: समाज की भागीदारी से मिलेगी सफलता

नदियों के विशेषज्ञ डॉ. विवेक चौरासिया के अनुसार, धार्मिक नगरों में पूजन सामग्री का विसर्जन एक बड़ी चुनौती है। हालांकि, नदियों के लिए सबसे बड़ा खतरा शहरों का सीवरेज और गंदे नाले हैं। उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा चलाए जा रहे सीवेज ट्रीटमेंट प्रोजेक्ट्स के साथ जब जन-भागीदारी (जैसे कि शिप्रा मॉडल) जुड़ जाती है, तो नदियों को स्वच्छ रखने का लक्ष्य हासिल करना कहीं अधिक आसान हो जाता है।

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