महाकाल मंदिर के पुजारियों ने बताए भगवान शिव को जगतगुरु और आदियुगी मानने के पौराणिक कारण
गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर जानिए क्यों भगवान शिव को जगतगुरु और आदियुगी कहा जाता है। उज्जैन के महाकाल मंदिर में उमड़ी श्रद्धालुओं की भारी भीड़।
उज्जैन: पंचांग और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, 29 जुलाई को गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व देशभर में बेहद श्रद्धा और धूमधाम के साथ मनाया जा रहा है। यह विशेष दिन गुरु के प्रति अपनी अटूट श्रद्धा, सर्वोच्च सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का सबसे बड़ा अवसर माना जाता है। इस पवित्र दिन पर शिष्य अपने गुरु का विधि-विधान से पूजन कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं और अपने जीवन में हमेशा सत्य, ज्ञान एवं सदाचार के मार्ग पर पूरी निष्ठा से चलने का संकल्प लेते हैं।
🙏 जिसका कोई गुरु नहीं, उसके परम गुरु हैं भगवान शिव
भारतीय सनातन संस्कृति में गुरु को साक्षात भगवान के समान दर्जा दिया गया है, क्योंकि केवल एक गुरु ही अज्ञानता के गहरे अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाता है।
लेकिन हमारी सनातन परंपरा में एक बेहद सुंदर मान्यता यह भी है कि यदि किसी भाग्यवश व्यक्ति को कोई भौतिक या लौकिक गुरु न मिल पाए, तो वह देवों के देव महादेव यानी भगवान शिव को अपना आध्यात्मिक गुरु मान सकता है। यही मुख्य कारण है कि बाबा महाकाल की नगरी उज्जैन में विराजमान विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर भगवान शिव को 'जगतगुरु' यानी पूरे ब्रह्मांड का गुरु भी कहा जाता है। यही वजह है कि गुरु पूर्णिमा के इस पावन पर्व पर महाकाल मंदिर में देश-विदेश से आने वाले दर्शनार्थियों की संख्या में भारी बढ़ोतरी देखने को मिलती है।
🔱 मनुष्यों के ही नहीं, बल्कि दानवों और देवताओं के भी गुरु हैं महाकाल
अखिल भारतीय पुजारी महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष और महाकालेश्वर मंदिर के वरिष्ठ पुजारी महेश शर्मा ने इस बारे में विस्तार से बताते हुए कहा, ''हमारे प्राचीन पुराणों में स्पष्ट रूप से वर्णित है कि भगवान शिव केवल साधारण मनुष्यों के ही नहीं, बल्कि सभी देवताओं, महान ऋषियों, सिद्धों, योगियों और यहां तक कि दानवों व असुरों के भी गुरु माने गए हैं।''
शिव ज्ञान, तपस्या, योग, वैराग्य और परम सत्य के सर्वोच्च प्रतीक हैं। वे ब्रह्मांड के एकमात्र ऐसे देव हैं, जिनका स्वरूप एक साथ निराकार और साकार दोनों रूपों में विद्यमान है। समय आने पर भगवान शिव ने ही इस सृष्टि की उत्पत्ति की है, और वही इसका पालन तथा संहार भी करते हैं। इस सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार के इस शाश्वत दिव्य चक्र में शिव की भूमिका ही उन्हें समस्त चराचर जगत का मार्गदर्शक बनाती है। इसी बेहद व्यापक और विराट स्वरूप के कारण उन्हें 'जगतगुरु' यानी संपूर्ण ब्रह्मांड के आदि गुरु की पदवी से सुशोभित किया गया है।
🧘♂️ भगवान शिव को कहा जाता है 'आदियोगी' और 'आदिगुरु'
महेश गुरु ने आगे जानकारी देते हुए बताया, ''धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, आदि काल में भगवान शिव ने ही अनेक ऋषियों, मुनियों और देवताओं को योग, ध्यान, तंत्र साधना, संगीत, आयुर्वेद और सर्वोच्च आत्मज्ञान का दिव्य उपदेश दिया था।''
इसी कारण से भगवान शिव को 'आदियोगी' और 'आदिगुरु' के रूप में भी पूजा जाता है, क्योंकि पूरी योग परंपरा की मूल शुरुआत शिव से ही मानी गई है। उनका यह असीम ज्ञान केवल किसी एक विशेष समुदाय, वर्ग या युग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण मानवता और पूरी प्रकृति के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है। लोकजीवन में एक बहुत पुरानी और प्रसिद्ध कहावत भी है कि "गुरु बनाओ जानकर और पानी पियो छानकर।" यानी किसी भी व्यक्ति को अपना गुरु बहुत ही सोच-समझकर और परखकर चुनना चाहिए, लेकिन यदि किसी कारणवश किसी व्यक्ति को कोई योग्य भौतिक गुरु न मिल सके, तो वह भगवान शिव को ही अपना मन ही मन गुरु मानकर अपनी आध्यात्मिक साधना का शुभारंभ कर सकता है।
📿 भगवान शिव को गुरु बनाने की कोई कठिन विधि नहीं
पुजारी महेश गुरु का कहना है कि बाबा भोलेनाथ बहुत भोले हैं, उनके लिए किसी प्रकार के आडंबर की आवश्यकता नहीं होती; उनके सामने केवल सच्ची श्रद्धा, निष्कपट भाव और नियमित साधना ही सबसे बड़ी भेंट मानी गई है।
भगवान महाकाल को अपना गुरु मानने की सबसे सरल और सहज साधना हर रोज पूरी श्रद्धा और नियम के साथ 'ॐ नमः शिवाय' महामंत्र का जप करना है। ऐसी गहरी मान्यता है कि 108 मानकों वाली रुद्राक्ष या पवित्र तुलसी की माला से इस पंचाक्षरी मंत्र का जाप करते हुए जो साधक भगवान शिव को अपना गुरु मानता है, वह जीवन में मानसिक शांति, अद्भुत आत्मबल, सही विवेक और उच्च आध्यात्मिक उन्नति को प्राप्त करता है। शिव भक्ति का मूल संदेश ही यही है कि इंसान अपने भीतर के अहंकार का पूर्ण त्याग कर हमेशा सत्य, करुणा, संयम और धर्म के रास्ते पर चले।
गुरु पूर्णिमा के इस पावन अवसर पर हजारों की संख्या में श्रद्धालु बाबा महाकाल के दरबार में हाजिरी लगाकर उनका आशीर्वाद लेते हैं और उन्हें अपना गुरु मानकर अपने जीवन को धर्म, ज्ञान और सदाचार के मार्ग पर आगे बढ़ाने की प्रार्थना करते हैं।
🌟 भैरव पूर्णिमा और कुल देवता के पूजन का महत्व
विख्यात पंडित एवं ज्योतिषाचार्य अमर डब्बेवाला ने इस विशेष पर्व पर प्रकाश डालते हुए बताया, ''पंचांग की सटीक गणना के अनुसार, आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की यह पूर्णिमा तिथि भैरव पूर्णिमा के रूप में भी जानी जाती है।''
वर्ष भर में आने वाली विभिन्न पूर्णिमाओं में इस तिथि का अपना एक विशिष्ट महत्व है, जो विशेष अनुष्ठानों और अपनी अटूट श्रद्धा को अभिव्यक्त करने का दिन माना जाता है। इस पावन दिन पर अपने कुल देवता या भगवान काल भैरव के रूप में भी उनकी विशेष पूजा-अर्चना करने की प्राचीन मान्यता है। परिवार में सुख-समृद्धि बनाए रखने और पारिवारिक जीवन की सभी प्रकार की बाधाओं व अशांति को दूर करने के लिए कुल देवता के रूप में भैरव जी का पूजन अत्यंत फलदायी माना गया है। जिन परिवारों में संतान का अभाव या सुख में कमी होती है, वे अपने कुल भैरव के रूप में अष्ट भैरव की भी विधिवत पूजा कर सकते हैं। वर्ष पर्यंत इस प्रकार का पूजन करने से कुल की वृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है और जीवन के तमाम बड़े संकटों व परेशानियों से हमेशा के लिए मुक्ति मिल जाती है।
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