सांदीपनि विद्यालयों में अंग्रेजी माध्यम की पढ़ाई पर संकट; शिक्षकों की कमी और भवन के अभाव से छात्र परेशान

मध्य प्रदेश की सांदीपनि विद्यालय योजना के 275 स्कूलों में संसाधनों का अभाव। अंग्रेजी माध्यम की किताबें और शिक्षक नदारद। छात्रों का सत्र पिछड़ने से अभिभावक चिंतित।

Jul 01, 2026 - 10:10
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सांदीपनि विद्यालयों में अंग्रेजी माध्यम की पढ़ाई पर संकट; शिक्षकों की कमी और भवन के अभाव से छात्र परेशान

भोपाल। प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी 'सांदीपनि विद्यालय योजना' का उद्देश्य सरकारी स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा उपलब्ध कराना था। इसके तहत राज्य भर के 275 विद्यालयों का चयन हुआ, जिनमें राजधानी भोपाल के आठ स्कूल भी शामिल हैं। हालांकि, शुरुआत से ही यह योजना समस्याओं और अव्यवस्थाओं के जाल में फंसी नजर आ रही है, जिससे छात्रों और अभिभावकों में भारी निराशा है।

📉 संसाधन नदारद: अभिभावकों का बढ़ रहा मोहभंग

योजना के तहत अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाने के नाम पर निजी स्कूलों को छोड़कर आए छात्रों का सत्र अब संकट में है। महात्मा गांधी सांदीपनि विद्यालय जैसे संस्थानों में अपेक्षित व्यवस्थाएँ न होने के कारण विद्यार्थी अब नाम कटवाने लगे हैं। कई विद्यालयों में सीटें खाली पड़ी हैं, जबकि जो छात्र दाखिल हुए हैं, वे नियमित पढ़ाई न हो पाने के कारण पिछड़ रहे हैं।

🏗️ भवन की कमी से दो पालियों में संचालन

विद्यालयों के सामने बुनियादी ढाँचे की बड़ी समस्या खड़ी हो गई है। माध्यमिक कक्षाओं के भवन को तोड़ने के विभागीय आदेशों के बाद, स्कूल को दो पालियों में चलाने का निर्णय लिया गया है:

  • पहली पाली (सुबह 7 से दोपहर 12 बजे तक): कक्षा 9वीं से 12वीं।

  • दूसरी पाली (दोपहर 12 से शाम 5 बजे तक): माध्यमिक कक्षाएं।

📚 शिक्षकों और पुस्तकों का टोटा

योजना को लागू करने के लिए जिस स्तर पर तैयारी की जानी चाहिए थी, वह नदारद है। प्राथमिक कक्षाओं में शिक्षकों की भारी कमी है, जिसके लिए स्कूल प्रबंधन द्वारा विभाग को पत्र लिखे जाने के बावजूद न तो नियमित नियुक्तियां हुईं और न ही अतिथि शिक्षकों की व्यवस्था हो पाई। इसके अतिरिक्त, पहली से आठवीं कक्षा तक के विद्यार्थियों के लिए अंग्रेजी माध्यम की पाठ्य-पुस्तकें भी अब तक उपलब्ध नहीं हो सकी हैं, जिससे अध्यापन कार्य पूरी तरह ठप पड़ा है।

⚠️ भविष्य पर मंडराते सवाल

शिक्षकों का चयन परीक्षा के आधार पर किया गया है, जिन्हें अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। बावजूद इसके, स्पष्ट पाठ्यक्रम और संसाधनों के अभाव में सत्र का शुरुआती दौर ही अंधकारमय नजर आ रहा है। यदि शिक्षा विभाग ने समय रहते इन बुनियादी कमियों को दूर नहीं किया, तो सरकार का यह 'क्वालिटी एजुकेशन' का मिशन विफल हो सकता है।

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