बांडी हरणगांव में पालतू बकरे को दी गई नम आंखों से विदाई, गांव की आस्था से जुड़ा था 'मालण बाबा'
मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले में इंसान और पशु के गहरे लगाव की अनोखी मिसाल देखने को मिली। पालतू बकरे 'मालण बाबा' की मृत्यु पर ग्रामीणों ने हिंदू रीति-रिवाजों से अंतिम संस्कार किया।
बड़वानी: मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले से इंसान और पशु के बीच गहरे आत्मीय लगाव की एक बेहद अनोखी और भावुक कर देने वाली मिसाल सामने आई है। जिले के ग्राम बांडी हरणगांव के समस्त ग्रामीणों ने अपने बेहद प्रिय पालतू बकरे 'मालण बाबा' की मृत्यु के बाद उसे पूरे सम्मान और पारंपरिक हिंदू रीति-रिवाजों के साथ अंतिम विदाई दी। इस अनूठी शवयात्रा में पूरे गांव के सैकड़ों ग्रामीण शामिल हुए। ढोल-बाजों की गूंज, बेहद भावुक कर देने वाला माहौल और ग्रामीणों की नम आंखें इस पूरी विदाई को हमेशा के लिए यादगार बना गईं।
🙏 हिंदू रीति-रिवाजों और परंपराओं के साथ हुआ अंतिम संस्कार
ग्रामीणों ने विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि यह बकरा सिर्फ एक पालतू पशु नहीं, बल्कि पूरे गांव की अगाध आस्था से जुड़ा हुआ था।
उसे स्थानीय लोकदेवता 'मालण बाबा' के नाम पर छोड़ा गया था, और तभी से पूरा गांव उसे बड़ी श्रद्धा और स्नेह के साथ 'मालण बाबा' कहकर ही पुकारता था। पिछले कई वर्षों से गांव की गलियों में पूरी तरह खुलेआम घूमने वाला यह बकरा हर ग्रामीण का चहेता बन चुका था। गाँव के छोटे-छोटे बच्चे उसके साथ खेलते थे, बुजुर्ग उसे स्नेह से दुलारते थे और हर कोई उसे बहुत शुभ मानता था। खास बात यह थी कि उसने कभी किसी को कोई नुकसान नहीं पहुँचाया और हमेशा एक शांत व मिलनसार स्वभाव के साथ गांव में रहता था।
🥁 ढोल-बाजों के साथ पूरे गांव में निकाली गई अंतिम यात्रा
जैसे ही इस प्रिय बकरे की मौत की खबर पूरे गांव में फैली, चारों तरफ शोक और मायूसी का माहौल छा गया।
ग्रामीणों ने मिलकर एक बैलगाड़ी को सुंदर फूलों और रंग-बिरंगे कपड़ों से सजाया और उस पर 'मालण बाबा' के पार्थिव शरीर को बेहद सम्मानपूर्वक रखा गया। इसके बाद पारंपरिक ढोल-बाजों की धुन के साथ पूरे गांव में उसकी भव्य अंतिम यात्रा निकाली गई। इस अनूठी शवयात्रा में गांव की महिलाएं, पुरुष, बुजुर्ग और बच्चे बहुत बड़ी संख्या में शामिल हुए। कई ग्रामीण अपने प्रिय पशु को खोकर भावुक होकर रो पड़े, जबकि कुछ लोग अपनी स्थानीय लोक परंपराओं के अनुसार नाचते-गाते हुए उसे अंतिम विदाई देते हुए नजर आए।
🕊️ आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना और अंतिम विदाई
यह अंतिम यात्रा गांव से निकलकर बाहर स्थित एक नाले के किनारे पहुँची, जहाँ पूरी धार्मिक मर्यादा और हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार बकरे का अंतिम संस्कार किया गया।
अंतिम संस्कार के दौरान सभी ग्रामीणों ने फूल अर्पित कर श्रद्धांजलि दी और उसकी आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना की। ग्रामीणों का कहना है कि 'मालण बाबा' केवल एक पालतू बकरा नहीं था, बल्कि वह इस पूरे गांव की आपसी आस्था, सांस्कृतिक परंपरा और अनूठे अपनत्व का एक जीवंत प्रतीक बन चुका था। यही सबसे बड़ा कारण रहा कि उसकी विदाई भी किसी परिवार के सगे सदस्य की तरह पूरे मान-सम्मान और श्रद्धा के साथ संपन्न की गई।
अब इस अनोखी और मार्मिक अंतिम यात्रा की चर्चा केवल बड़वानी जिले में ही नहीं, बल्कि आसपास के तमाम क्षेत्रों में भी बड़े पैमाने पर हो रही है। लोग इसे इंसानों और बेजुबान पशुओं के बीच सच्चे प्रेम, असीम संवेदनशीलता और भारतीय ग्रामीण संस्कृति का एक बेजोड़ उदाहरण मान रहे हैं।
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