वक्त के साथ खो रही भारतीय संस्कृति की पहचान; क्या नई पीढ़ी बचा पाएगी शहनाई का मान?
सागर के शहनाई वादक मुनीम भाई के हुनर की कहानी। बदलते वक्त और डीजे के दौर में कैसे गुम हो रही है पारंपरिक शहनाई। जानें शहनाई के इतिहास और मुनीम भाई का संघर्ष।
सागर। एक दौर था जब विवाह हो या मांगलिक कार्यक्रम, शहनाई की धुन के बिना खुशियां अधूरी मानी जाती थीं। लेकिन बदलते वक्त और डीजे के शोर ने इस पारंपरिक वाद्य यंत्र की रौनक छीन ली है। सागर के 65 वर्षीय मशहूर शहनाई वादक मुनीम भाई, जो 15 साल की उम्र से इस कला को जी रहे हैं, आज बेहद अकेले महसूस करते हैं। न तो उनकी नई पीढ़ी और न ही युवा वर्ग अब शहनाई सीखने में रुचि दिखा रहा है।
📜 शहनाई का गौरवशाली इतिहास और नामकरण
पारंपरिक वाद्य यंत्र 'शहनाई' का विकास मुगलकाल में हुआ था। किंवदंती है कि औरंगजेब ने जब 'पुंगी' या 'बीन' पर प्रतिबंध लगाया, तब वादकों ने इसमें सुधार कर सात छेद वाली नली तैयार की। मुगल दरबार में इसे बजाने वाला एक नाई था, इसीलिए इसे 'शाह' और 'नाई' के मेल से 'शहनाई' नाम दिया गया। धीरे-धीरे यह भारतीय संस्कृति का अटूट हिस्सा बन गई और देश के हर शुभ कार्य में इसकी गूंज सुनाई देने लगी।
📉 सम्मान और कमाई के दौर में ढलान
मुनीम भाई याद करते हैं कि पहले उन्हें बड़ी इज्जत और सम्मान के साथ बुलाया जाता था। उनकी टीम में ढोलक, तबला और बैगपाइपर जैसे वाद्ययंत्रों का सामंजस्य होता था, जिससे एक बेहतरीन माहौल बनता था। मुनीम भाई ने देश के मशहूर शहनाई वादकों के साथ काम किया है। उन्होंने बताया, "अब डीजे और शोर-शराबे का दौर है। हमें सिर्फ विदाई या कुछ चुनिंदा सरकारी कार्यक्रमों में बुलाया जाता है, जिससे आजीविका चलाना कठिन हो गया है।"
🎶 नई पीढ़ी का मोहभंग और उम्मीद की किरण
मुनीम भाई के बेटों ने पुश्तैनी हुनर को न अपनाकर अन्य रोजगार चुन लिया है, क्योंकि शहनाई बजाना कड़ी मेहनत और फेफड़ों की मजबूती का काम है। हालांकि, निराशा के इस माहौल में भी एक छोटी सी उम्मीद की किरण बाकी है—मुनीम भाई अपने भांजे को शहनाई की बारीकियां सिखा रहे हैं। वे आज भी मुहर्रम पर मर्सिया, राष्ट्रीय पर्वों पर देशभक्ति और विदाई के समय ऐसी मार्मिक धुनें बजाते हैं कि सुनने वाले की आंखें नम हो जाती हैं।
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