नगर निगम की लापरवाही से बंद पड़े थैला एटीएम; बाजार में धड़ल्ले से जारी पॉलिथीन का उपयोग

अंतर्राष्ट्रीय प्लास्टिक बैग मुक्ति दिवस पर भोपाल की हकीकत। शहर भर में लगे 'थैला एटीएम' बंद, प्लास्टिक का उपयोग जारी। नगर निगम की लचर व्यवस्था पर एक रिपोर्ट।

Jul 03, 2026 - 19:40
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नगर निगम की लापरवाही से बंद पड़े थैला एटीएम; बाजार में धड़ल्ले से जारी पॉलिथीन का उपयोग

भोपाल। हर साल 3 जुलाई को अंतर्राष्ट्रीय प्लास्टिक बैग मुक्ति दिवस मनाया जाता है, जिसमें सिंगल-यूज प्लास्टिक के त्याग का संकल्प लिया जाता है। लेकिन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में तस्वीर इसके बिल्कुल विपरीत है। शहर को प्लास्टिक मुक्त बनाने के लिए लाखों रुपये खर्च करके लगाए गए 'थैला एटीएम' अब कबाड़ में तब्दील हो रहे हैं। सब्जी मंडियों और बाजारों में प्रतिबंधित पॉलिथीन का उपयोग धड़ल्ले से जारी है।

❌ गलत लोकेशन और देखरेख का अभाव

नगर निगम ने शहर के प्रमुख स्थानों पर थैला एटीएम स्थापित किए थे, ताकि लोग आसानी से कपड़े या जूट के थैले ले सकें। हालांकि, सर्वे की कमी के कारण अधिकांश मशीनें गलत स्थानों पर लगाई गईं। उदाहरण के लिए, एमपी नगर में पेट्रोल पंप के पास मशीन लगाई गई, जहां थैले की जरूरत ही नहीं होती। वहीं, 10 नंबर मार्केट में एटीएम को बाजार से इतनी दूर लगाया गया है कि लोग वहां तक पहुंच ही नहीं पाते। इन मशीनों में न तो समय पर थैलों की रिफिलिंग की जाती है और न ही इनकी मरम्मत हो रही है।

📍 एटीएम पॉइंट्स की स्थिति: बंद और बेकार
  • 6 नंबर हाकर्स कार्नर: यहां लगा थैला एटीएम पूरी तरह बंद पड़ा है। सिक्के डालने पर वापस आ जाते हैं, लेकिन थैला बाहर नहीं निकलता, जिससे ग्राहक प्लास्टिक कैरी बैग लेने को मजबूर हैं।

  • 10 नंबर मार्केट: निगम के जोनल ऑफिस और कचरा कैफे के पास लगा एटीएम भी पूरी तरह निष्क्रिय है। फिलहाल, इस मशीन के सामने वाहन खड़े किए जा रहे हैं।

  • एमपी नगर (प्रगति पेट्रोल पंप): यहां स्थित मशीन न केवल बंद है, बल्कि अपनी खराब हालत के कारण जमीन पर गिरने की कगार पर है।

📉 समाधान के बजाय सिर्फ दिखावा

पर्यावरण विशेषज्ञों और स्थानीय निवासियों का कहना है कि केवल प्रतिबंध लगाने से प्लास्टिक का उपयोग नहीं रुकेगा। जब तक आम जनता को थैलों का सस्ता और सुलभ विकल्प नहीं मिलेगा, तब तक वे पॉलिथीन का ही सहारा लेंगे। 'थैला एटीएम' जैसी बेहतरीन योजना का दम तोड़ना नगर निगम की प्रशासनिक विफलता को दर्शाता है। यदि इन मशीनों का नियमित संचालन और उचित प्रचार-प्रसार किया जाता, तो शायद भोपाल आज सही मायनों में प्लास्टिक मुक्त होने की ओर कदम बढ़ा चुका होता।

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