देश में बढ़ती पोर्नोग्राफी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त,
4 सप्ताह बाद फिर होगी सुनवाई
(सेंधवा). सेंधवा के सामाजिक कार्यकर्ता बी.एल. जैन की जनहित याचिका पर कोर्ट ने मांगा जवाब
13 से 18 वर्ष की आयु के युवाओं में बढ़ती प्रवृत्ति
देश में 13 से 18 वर्ष की आयु के युवाओं के बीच पोर्न वीडियो देखने की बढ़ती प्रवृत्ति समाज और संस्कृति के लिए गंभीर खतरा बनती जा रही है। इसी मुद्दे पर सेंधवा के सामाजिक कार्यकर्ता एवं अधिवक्ता बी.एल. जैन द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जनहित याचिका पर मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई और जस्टिस के. विनोद चन्द्रन की पीठ ने सुनवाई करते हुए चार सप्ताह बाद अगली सुनवाई की तिथि निर्धारित की है।
भारत में वर्तमान में 20 करोड़ से अधिक वीडियो उपलब्ध
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता वरुण ठाकुर ने अदालत को बताया कि भारत में वर्तमान में 20 करोड़ से अधिक पोर्न वीडियो, जिनमें चाइल्ड पोर्नोग्राफी भी शामिल है, खुलेआम इंटरनेट पर उपलब्ध हैं। जबकि अनेक देशों — जैसे यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, चीन और अरब देशों — ने ऐसे कंटेंट पर पूर्ण प्रतिबंध लगा रखा है।
2005 से हर सेकंड लगभग 5 हजार पोर्न साइटें एक्सेस
अदालत को बताया गया कि सन् 2005 से हर सेकंड लगभग 5 हजार पोर्न साइटें एक्सेस की जा रही हैं, और कोविड महामारी के बाद डिजिटल पहुंच बढ़ने से बच्चों की पहुंच इस सामग्री तक और आसान हो गई है। परिणामस्वरूप, नाबालिगों के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है और समाज में विकृत प्रवृत्तियाँ पनप रही हैं।
अपराध, बलात्कार, यौन उत्पीड़न और आत्महत्याओं के मामलों में वृद्धि
वरुण ठाकुर ने दलील दी कि महिलाओं के खिलाफ अपराध, बलात्कार, यौन उत्पीड़न और आत्महत्याओं के मामलों में वृद्धि का एक बड़ा कारण अश्लील वीडियो और पोर्नोग्राफी की लत है। यह प्रवृत्ति न केवल समाजिक ढांचे को कमजोर कर रही है, बल्कि रिश्तों के टूटने और पारिवारिक विघटन को भी बढ़ावा दे रही है।
संस्कारों की भूमि, भारत इस मामले में अब भी पिछड़ा
याचिकाकर्ता की ओर से सर्वोच्च न्यायालय को यह भी बताया गया कि संस्कारों की भूमि भारत इस मामले में अब भी पिछड़ा हुआ है। इसलिए भारत सरकार को वयस्कता की आयु के समीप युवाओं के लिए पोर्न सामग्री देखने पर प्रतिबंध लगाने, एक राष्ट्रीय नीति बनाने और ठोस कार्ययोजना तैयार करने की आवश्यकता है।
याचिका में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69 का हवाला दिया गया है, जो केंद्र सरकार को कंप्यूटर माध्यम से अनुचित सामग्री की सार्वजनिक पहुंच अवरुद्ध करने का अधिकार देती है। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार इस अधिकार का समुचित उपयोग करने में विफल रही है।
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69 का हवाला
इस मामले में भारत सरकार के सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, गृह मंत्रालय, दूरसंचार विभाग और इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनियों को प्रतिवादी बनाया गया है।
अदालत ने आगे की कार्रवाई के लिए 4 सप्ताह बाद सुनवाई की अगली तिथि निर्धारित की है।
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